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बेहतरीन प्रतिफल हैं प्रापर्टी में निवेश के | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऐसा कम होता है, पर ऐसा हो रहा है कि तीनों बाज़ार–सर्राफ़ा (सोना-चांदी बाजार), स्टॉक बाज़ार और प्रापर्टी बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहे हैं. सन् 2005 में ही दिल्ली और मुंबई में औसतन 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी प्रापर्टी बाज़ार की कीमतों में हुई है. दरअसल अब का दृश्य लगभग असामान्य है और इसके ऐसे ही रहने के आसार कम से कम दस सालों तक हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था जबरदस्त बूम के दौर से गुजर रही है. स्थिति यह है कि 2002 में भारत में सिर्फ़ तीन शापिंग माल थे. अब पूरे देश के तमाम शहरों में करीब 400 शापिंग माल बन रहे हैं. सिर्फ़ महानगरों में ही नहीं, छोटे शहरों में भी. देश में प्रापर्टी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है. नौजवान अपने मकान बनाने की बहुत जल्दी में है. दस साल पहले मकान मालिक बनने की औसत आयु 45 साल थी, यह गिरकर अब 32 साल हो गई है. साफ्टवेयर, मीडिया जैसे नये उभरते उद्योगों से होने वाली मोटी कमाई के चलते मकानों की मांग बढ़ी है, दफ्तरों की जगह की मांग बढ़ी है. अकेले मुंबई में आने वाले दस वर्षों में करीब दो लाख मकानों की मांग संभावित है. ऐसी मांग, जिसके पीछे पर्याप्त क्रय क्षमता है. भारतीय प्रापर्टी बाज़ार इस तरह की स्थितियों से आने वाले कुछ सालों तक इसलिए गुजरेगा कि आप्रवासी भारतीय भी भारत में एक घर बनाने को अच्छा निवेश मानने लगे हैं. दिल्ली, मुंबई के आसपास के इलाके जैसे गुड़गांव, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद में पिछले तीन-चार सालों में प्रापर्टी की कीमतें लगभग दो से तीन गुनी हो गईं हैं. प्रापर्टी से बेहतर प्रतिफल सिर्फ़ शेयर बाज़ार ने दिए हैं. पर ग़ौरतलब है कि शेयर बाज़ार में निवेश के मुकाबले प्रापर्टी में निवेश बहुत कम जोखिम का है. निवेश महानगरों के आसपास के इलाकों में निवेश करके प्रतिफल कमाने के मौके अब भी मौजूद हैं, क्योंकि बीपीओ काराबोर के बेहतर होने की वजह से और ज्यादा दफ्तर और रहने की जगह की मांग दिल्ली के आसपास के इलाक़ों में बढ़ेगी. उधर मुंबई में पुरानी कपड़ा मिलों को वाणिज्यिक प्रयोग की अनुमति सुप्रीम कोर्ट द्वारा दे दिए जाने से मुंबई में नए शापिंग माल, दफ्तर आदि बनेंगे. न्यूनतम 10 प्रतिशत और अधिकतम सौ प्रतिशत सालाना तक का प्रतिफल देने वाले प्रापर्टी बाजार में आप्रवासी भारतीय नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुड़गांव, ठाणे की संपत्तियों में पैसा लगाने की सोच सकते हैं. मुंबई और दिल्ली के आसपास कई बिल्डरों ने सिर्फ आप्रवासी भारतीयों को ध्यान में रखकर कुछ कॉम्पलेक्स और कॉलोनियां विकसित की हैं. भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के तहत आप्रवासी भारतीयों को भारत में घर या दफ्तर खरीदने और उन्हे किराये पर देने के लिए रिजर्व बैंक की अनुमति की ज़रुरत नहीं है. प्रापर्टी खरीदने के लिए आप्रवासी भारतीयों को भारत आने की ज़रुरत भी नहीं है. उनका कोई अधिकृत प्रतिनिधि उनकी तरफ से प्रक्रिया संपन्न कर सकता है. कई बैंक और प्रापर्टी ब्रोकर सिर्फ आप्रवासी भारतीयों के लिए इस संबंध में विशेषज्ञ सेवाएं भी दे रहे हैं, उनसे संपर्क करके आप्रवासी निवेशक अपनी मुश्किलें आसान कर सकते हैं. |
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