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भारत: तेज़ी से बदलती पहचान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बहुत अरसा नहीं हुआ जब भारत की पहचान सपेरों के देश के रूप में हुआ करती थी. दशकों तक भारत अंधविश्वास के देश की छवि से जूझता रहा. उसे ग़रीबी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार के लिए जाना जाता था. अंतरराष्ट्रीय जगत में वह उपहास का पात्र था. 21वीं सदी भारत के लिए नई पहचान लेकर आई. जहाँ एक ओर आर्थिक सुधारों ने उसकी पहचान आर्थिक महाशाक्ति के रूप में कर दी वहीं दूसरी ओर ज्ञान आधारित उद्योगों ने उसकी छवि को सॉफ्टवेयर और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सिद्धहस्त लोगों के देश के रूप में स्थापित कर दिया. विज्ञापन विशेषज्ञ प्रसून जोशी का कहना है कि ऐसा नहीं कि भारत रातोंरात बदल गया है. दरअसल अर्थव्यवस्था मुक्त किए जाने से दृष्टिकोण बदला है. उनका कहना था कि जिस जनसंख्या को देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक माना जाता था, उसी ने भारत को आकर्षक बाज़ार बना दिया है. माना जा रहा है कि भारत एक मज़बूत अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के रूप में स्थापित हो गया है. बॉलीवुड से भारतीय अध्यात्म तक सभी धड़ल्ले से चल रहा है. इस कायाकल्प का श्रेय ज्ञान आधारित उद्योगों को जाता है जिसमे भारतीयों ने शानदार प्रदर्शन किया. समाजशास्त्री प्रोफेसर दीपांकर गुप्ता का कहना है कि इसमें कोई शक नहीं कि भारत की छवि बदली है. लेकिन इसके पीछे केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि सामरिक कारण भी हैं. उनका कहना है कि भारत की आबादी के लिहाज से सूचना तकनीक के क्षेत्र में 30 लाख लोगों की संख्या बहुत कम है लेकिन उनका योगदान बहुत अधिक है. भारतीय पेशेवर एक आकलन के अनुसार सन् 2025 तक भारत अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन के क्षेत्र में दुनिया को नेतृत्व प्रदान कर रहा होगा. बिड़ला प्रबंधन और तकनीकी संस्थान के निदेशक डॉक्टर हरिवंश का कहना है कि भारत में इस समय आबादी का केवल 11 फ़ीसदी लोग उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जाते हैं और अगले कुछ वर्षों में यह संख्या 50 फ़ीसदी तक बढ़ सकती है जिसका परिणाम होगा बड़ी संख्या में पेशवर और ग़ैरपेशवेर लोगों की उपलब्धता.
उनका कहना है कि अगले 10 से 15 वर्षों में भारतीय शिक्षा अंतरराष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों से जुड़ जाएगी क्योंकि भारतीय संस्थान विदेशों में अपने परिसर खोल रहे हैं और विदेशी विश्वविद्यालय भारत में आ रहे हैं. दरअसल आज़ादी के बाद भारत ने समाजवादी मॉडल को अपनाया. लेकिन 1991 में जब आर्थिक उदारीकरण के दरवाज़े खोले गए तो देश में एक नई बयार बहने लगी. एक आकलन के अनुसार अब स्थिति यह है कि अमरीका में हर 20 डॉक्टरों में से एक भारतीय है और विदेशों में बसे भारतीय सालाना लगभग 15 अरब डॉलर की राशि भेज रहे हैं. तेज़ी से ब़ढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था ने विदेशी निवेशकों को ख़ासा लुभाया है. सन 2005-06 में भारत में विदेशी निवेश 7.7 अरब डॉलर तक पहुँच गया और मार्च,2007 तक इसके 9 अरब डॉलर के स्तर तक पहुँचने की संभावना है. आर्थिक विश्लेषक डॉक्टर आलोक पुराणिक का कहना है कि भारतीय छवि में बदलाव के राजनीतिक और आर्थिक कारण दोनों हैं. उनका कहना है कि इसका श्रेय राजनीतिक और आर्थिक नीतियों में स्थिरता को जाता है. वामपंथी भी टाटा को सिंगूर में एसईज़ेड के लिए ज़मीन देने के लिए कटिबद्ध नज़र आते हैं. वो कहते हैं कि टाटा के कोरस के अधिग्रहण जैसी घटनाओं से भी भारतीय ब्रांड और मज़बूत हुआ है. अब तक माना जाता था कि भारतीय उद्योगजगत में हिम्मत नहीं है लेकिन कोरस के अधिग्रहण ने भारतीयों का हौसला और छवि दोनों मज़बूत की है. |
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