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अपनी बदहाली पर रोता गोपालगंज | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार को तीन-तीन मुख्यमंत्री देने वाला गोपालगंज संसदीय क्षेत्र बदहाल शिक्षा और बेरोज़गारी की समस्या से जूझ रहा है. इसी मुद्दे पर बीबीसी हिंदी के रोडशो में परिचर्चा आयोजित की गई जिसमें लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी बात रखी. परिचर्चा में राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री सुरेंद्र सिंह से लेकर स्थानीय जिलाधिकारी और कई बड़े अधिकारी शामिल हुए लेकिन अधिकारियों के ख़िलाफ जनता और ख़ासकर युवाओं में ज़बरदस्त आक्रोश देखा गया. इलाक़े में कई स्कूल और कॉलेज हैं लेकिन सत्र ठीक से नहीं चलता है. एक छात्र का कहना था कि पिछले दिनों फ़ॉर्म भरे जाने के दस दिनों के बाद ही परीक्षाएं रखी गईं. ऐसे में कोई कैसे अच्छे नंबर ला सकता है. हालाँकि मंच पर मौजूद शिक्षिका डॉ. अनुजा सिंह का कहना था कि बदहाल शिक्षा के लिए केवल शिक्षकों या व्यवस्था को दोष देना ठीक नहीं है. उनका कहना था कि अभिभावक भी बहुत ज़िम्मेदार हैं और वो चाहते हैं कि उनके बच्चे आईएएस ही बनें जो संभव नहीं है. कई युवकों ने यहाँ तक कहा कि पढ़ाई कर के भी अगर गांवों में काम करना है तो पढ़ने की क्या ज़रूरत है. बदहाली इलाक़े में चार चीनी मिलें हैं जिसमें एक बंद हो चुकी हैं. पास के मीरगंज में तीन अन्य मिलें बंद हो चुकी हैं.
इन सवालों के जवाब में ज़िलाधिकारी मुरलीधर राय का कहना था कि इन मिलों को शुरू करने की पूरी कोशिश की जा रही है. हालाँकि लोग इन वादों से सहमत नहीं हुए. चर्चा में शामिल विष्णु चीनी मिल के मालिक का कहना था कि इलाक़े में न केवल कृषि आधारित उद्योग की शुरुआत होनी चाहिए बल्कि तकनीकी कॉलेज भी खोले जाने चाहिए. लेकिन एक शिक्षित बेरोज़गार लड़की स्वीटी कुमारी ने बताया कि वो बायोटेक्ऩलॉजी में एमएससी कर चुकी हैं और इसके बावजूद भी उन्हें अपने ज़िले की चीनी मिलों में काम नहीं मिल पाया है. शिकायतें, शिकायतें और शिकायतें....क्या गोपालगंज का कोई भविष्य है. वो ज़िला जहाँ से लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और बिहार के पहले अल्पसंख्यक मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर आए हैं, ऐसा ही बदहाल रह जाएगा. दूर से आए एक उद्यमी रवि कुमार परमार्थी कहते हैं कि युवाओं की मानसिकता बदलनी होगी. उन्होंने कहा," यहाँ सब चाहते हैं सरकारी नौकरी मिले. यह तो संभव नहीं है. स्वरोज़गार करना होगा. हर आदमी सरकारी नौकरी नहीं कर सकता. मानसिकता बदलेंगे तो सभी को रोज़गार मिलेगा." सवाल, जवाब और उम्मीदों के साथ गोपालगंज में परिचर्चा का अंत हुआ जो बीबीसी हिंदी रोडशो का अंतिम पड़ाव भी था. | इससे जुड़ी ख़बरें क्यों प्यासा है देवों का घर10 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस अवैध हथियारों का ढेर और मुंगेर14 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस एक सपना हाजीपुर का20 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस बीबीसी हिन्दी रोड शो कार्यक्रम13 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस काग़ज़ और क़ैंची का कलाकार13 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस सिवान में क़ानून-व्यवस्था पर चर्चा22 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'मैं, जो पहली बार बिहार आई हूँ...'23 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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