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गुरुवार, 14 दिसंबर, 2006 को 10:13 GMT तक के समाचार
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अवैध हथियारों का ढेर और मुंगेर

मुंगेर में बीबीसी का कारवाँ
आम आदमी की आवाज़
गंगातट पर बसा मुंगेर...महाभारतयुगीन अंगप्रदेश के राजा महादानवीर कर्ण की नगरी मुँगेर..पुरातन क़िला और कष्टहरणि घाट, जहाँ कभी राजा कर्ण जाया करते थे सूर्य की उपासना करने, उस कष्टहरणि घाट वाली गंगा के किनारे बसा मुंगेर... बीबीसी हिंदी सेवा का प्रणाम इस मुंगेर को.

बीबीसी के बिहार संवाददाता मणिकांत ठाकुर के इन शब्दों के साथ शुरू हुई परिचर्चा बीबीसी हिंदी कारवाँ की जिसका अगला पड़ाव मुंगेर था.

शहर के प्रतिष्ठित ब्रिटिशकालीन कॉलेज आरडी एंड डीजे कॉलेज के परिसर में खुले आकाश तले हुई खुली बहस, मुंगेर में अवैध हथियारों का चलन और बढ़ते अपराध पर.

हथियार और मुंगेर का नाता बड़ा विसंगति भरा है. मुंगेर में है मशहूर मुंगेर गन फ़ैक्ट्री जहाँ कई दशकों से में बंदूक-राइफ़ल बनते हैं. लेकिन विसंगति ये है कि आज मुंगेर में जहाँ हज़ारों की संख्या में हथियार वैध तरीक़े से बनते हैं तो अवैध तरीक़े से बननेवाले हथियारों की संख्या लाखों में होती जा रही है.

चाहे आम आदमी हो या प्रशासन, हर किसी को पता है कि मुंगेर में अवैध तरीक़े से हथियारों का कारोबार चलता है, लेकिन विडंबना ये है कि बीमारी और उसकी दवा क्या है, ये पता होने के बावजूद, बीमारी ना केवल बनी हुई है बल्कि बढ़ती जा रही है.

कौन है ज़िम्मेदार

बीबीसी की बहस में समाज के अलग-अलग हिस्सों के प्रतिनिधि जुटे और सबने अपने हिसाब से समस्या की चीर-फाड़ की.

अगर आम लोगों की आवाज़ को एक लाइन में समेटा जाए तो ये सार निकलता है, “प्रशासन को सब पता है और वो चैन की नींद सो रहा है. प्रशासन चाहे तो इलाज एक पल में निकल सकता है“.

डीएसपी मुंगेर
ये जो प्रशासन है सब जानती है

प्रशासन की ओर से जवाब दिया मुंगेर के डीएसपी(मुख्यालय) धनंजय कुमार सिंह ने जिनका कहना था," मुंगेर में अवैध हथियार बनते हैं इससे मैं इनकार बिल्कुल नहीं कर रहा और प्रशासन में भी कमी है ये भी मैं स्वीकार करता हूँ. लेकिन हम मूकदर्शक नहीं हैं क्योंकि ऐसा होता तो अवैध हथियारों के पकड़े जाने की ख़बरें आपको नहीं मिलतीं."

प्रशासन ने न्याय प्रक्रिया की जटिलताओं और सूचना-गवाही देने में आम आदमी से सहयोग ना मिलने का भी रोना रोया तो अवकाशप्राप्त न्यायाधीश श्याम सुंदर दास ने भी इससे सहमित जताई.

न्यायाधीश श्याम सुंदर दास ने कहा,"ये सही बात है कि क़ानून का पालन नहीं हो पाता. जाँच प्रक्रिया पूरी होने में देरी तो होती ही है, कभी-कभी बाहरी प्रभाव के कारण सही तरह से न्याय भी नहीं हो पाता है."

गंदी है गंगोत्री

वहीं मुंगेर के वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकांत मिश्रा का मत था कि क़सूर प्रशासन से भी अधिक राजनेताओं का है.

लक्ष्मीकांत मिश्रा ने कहा,"इस समस्या की गंगोत्री है राजनीति. हमारे यहाँ जब राजनेता आते हैं तो क़ानूनी-ग़ैर क़ानूनी हथियारों का जो प्रदर्शन होता है, उस समय हमारे राजनेता क्यों ख़ामोश रह जाते हैं."

समस्या का एक आर्थिक पहलू भी है जो जुड़ा है मुंगेर बंदूक कारख़ाने से. इसपर रोशनी डाली शहर के दो व्यवसायियों निलेश कुमार और विनोद केसरी ने.

निलेश कुमार ने कहा,"फ़ैक्ट्री में मज़दूरों का परिवार बढ़ा, ख़र्च बढ़ा लेकिन उनकी कमाई नहीं बढ़ी. नतीजा भूखे-बेबस लोगों ने मजबूर होकर ग़लत-सही हर रास्ता अपना लिया."

समस्या के निदान के लिए कुछ लोगों ने मुंगेर बंदूक कारखाने को और आधुनिक बनाए जाने और इसे एक व्यापक उद्योग का दर्जा दिए जाने का उपाय सुझाया.

विवेक

हालाँकि जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहे कई आम लोगों ने मजबूरी और बेबसी की दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

मुंगेर में बीबीसी के कारवाँ का स्वागत करते लोग
मुंगेर में बीबीसी के कारवाँ का स्वागत करते लोग

एक आत्मसम्मानी बीबीसी श्रोता की आवाज़ थी,"मैं बेरोज़गार हूँ लेकिन मैं संघर्ष करूँगा, सही अवसर की प्रतीक्षा करूँगा. रिक्शेवाला भी तो मज़दूरी करता है, वो तो चोरी नहीं करने लगता."

देखा जाए तो बीमारी एक है, डॉक्टर अनेक, दवाईयाँ अनेक. चाहे प्रशासन हो चाहे आम आदमी सबको ग़लतियों का आभास है.

और मुंगेर में अवैध हथियारों की इस उलझी हुई गुत्थी की सुलझी हुई बात भी यही है कि तमाम अँधेरों के बीच आत्मविवेक की लौ भी झिलमिला रही है.

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