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वामपंथी भी परमाणु संधि से ख़ुश नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के बाद अब सरकार को समर्थन देने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी अमरीका के साथ परमाणु संधि का विरोध किया है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस पर संसद में बहस की मांग की. सीपीएम का कहना है कि प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में 17 अगस्त को इस मुद्दे पर बहस के दौरान जो आश्वासन दिए थे, उन्हें इस समझौते में स्थान नहीं दिया गया है. साथ ही इन्हें बदल कर और कड़ा कर दिया गया है. सीपीएम महासचिव प्रकाश करात का कहना था कि पार्टी पोलित ब्यूरो ने पूरे विधेयक का अध्ययन किया है और उन्होंने पाया कि इसमें भारत को जो आश्वासन दिए गए थे उन्हें पूरा नहीं किया गया है. करात का कहना था कि इस मुद्दे पर संसद में पूरी बहस होनी चाहिए और उसके बाद ही इस विधेयक को लागू करने के लिए भारत और अमरीका के बीच वन, टू, थ्री (विधेयक में भारत से संबंधित धाराएँ) द्विपक्षीय समझौते के लिए बातचीत शुरू होनी चाहिए. उनका कहना था," हमारा कहना है कि एक बार फिर गोल पोस्ट बदले गए हैं. हम चाहते हैं कि इस पर बहस हो क्योंकि इस संधि के आधार पर द्विपक्षीय समझौते के लिए बातचीत नहीं हो सकती. हम बहस चाहते हैं. हमने प्रधानमंत्री के 17 अगस्त के भाषण के आधार पर इसका मूल्यांकन किया है और पाया कि हम पर और कड़ी शर्तें लगा दी गई हैं." विरोध जब से इस परमाणु समझौते को अमरीकी संसद से मंज़ूरी मिली है विरोध के स्वर मुखर हो उठे हैं. विदेश मंत्री प्रणव मुख़र्जी को सोमवार को संसद में इस पर बयान देना था लेकिन अल्पसंख्यकों के बारे में प्रधानमंत्री के बयान को लेकर हंगामा हुआ और संसद स्थगित हो गई. सूत्रों के मुताबिक़ सरकार का तर्क है कि जिस परमाणु समझौते को मंज़ूरी मिली है वो अमरीका का अंदरुनी क़ानून है और जब द्विपक्षीय समझौते पर बातचीत होगी तो भारत 18 जुलाई 2005 और मार्च महीने के संयुक्त घोषणापत्र में किए गए वायदों को पूरा करने पर ज़ोर देगा. हालाँकि वामपंथी दल कहते हैं कि जब वन, टू, थ्री समझौते का आधारभूत ढाँचा यानी परमाणु समझौते में ही समस्या है तो पहले उसी पर बहस होनी चाहिए. सीपीएम को कई और आपत्तियाँ भी हैं. करात कहते हैं, "अमरीका ने कई और नई शर्तें लगा दी हैं. समझौते के तहत अमरीका हमें स्थायी रूप से परमाणु ईंधन देने के लिए बाध्य नहीं होगा और अग़र अमरीका ईंधन देना रोकता है तो भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) के किसी सदस्य से भी मदद नहीं ले सकेगा." पार्टी ने इस संधि में नौ बार ईरान के ज़िक्र का भी विरोध किया और कहा कि भारत और अमरीका के बीच परमाणु संधि की प्रस्तावना में ईरान का नाम आना आपत्तिजनक है और इतना ही नहीं यह कहना कि भारत की विदेश नीति अमरीकी नीति से मेल खाती हो, किसी को स्वीकार नहीं हो सकता. पिछले ढाई वर्षों में सरकार के विरोध में कई बार भाजपा और वाम दलों के सुर एक हुए हैं और इस मुद्दे पर भी एक बार फिर दोनों ही पार्टियां सरकार को घेरने की तैयारी में दिख रही हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें बुश ने परमाणु विधेयक का स्वागत किया11 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस भाजपा ने परमाणु संधि का विरोध किया10 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'समझौता तय शर्तों पर होने की उम्मीद'07 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस परमाणु समझौते पर बातचीत07 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस सोरेन मामले पर संसद में भीषण हंगामा29 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'चीन को परमाणु समझौता स्वीकार'26 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस परमाणु संयंत्रों को ख़तरा बढ़ा: पाटिल22 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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