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न्यायिक परिषद के गठन का रास्ता साफ़ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय न्याय आयोग की सिफ़ारिश पर कैबिनेट समिति ने नई राष्ट्रीय न्यायिक परिषद के गठन के लिए एक विधेयक के मसौदे को मंज़ूरी दे दी है. एक लंबे अरसे से उच्च न्यायायल के जजों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और मुकदमों को ग़लत तरीके से प्रभावित करने के मामले मीडिया की सुर्खियाँ बनते रहे हैं लेकिन उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई के विकल्प अत्यंत सीमित रहे हैं. न्यायिक परिषद के गठन का उद्देश्य उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और दुर्व्यव्हार के मामलों की जांच को आसान बनाना है. कहा जा रहा है कि यह न्यायिक प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने में काफ़ी महत्वपूर्ण होगा. कैबिनेट समिति की बैठक के बाद पत्रकारों को इसकी जानकारी देते हुए वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा , "सर्वोच्च न्यायालय के किसी जज के ख़िलाफ़ शिकायत की जांच सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीश और मुख्य न्यायाधीश की समिति करेगी". "उच्च न्यायायलय के किसी न्यायाधीश के ख़िलाफ़ आरोपों की जांच सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश, सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीश और उच्च न्यायालयों के दो मुख्य न्यायाधीश करेंगे और इनकी नियुक्त सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश करेंगे". संसद में प्रस्ताव लाना होगा पी चिदंबरम ने कहा कि इस जांच के लिए संसद में पहले प्रस्ताव लाना होगा और उसके बाद न्यायिक आयोग जाँच कर के किसी जज के पक्ष में या उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की सिफ़ारिश करेगा. कानूनविदों का कहना है कि इस आयोग के गठन से पहले उच्च न्यायलय के ऐसे जजों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए लिए रास्ता काफ़ी मुश्किल था जिनके ऊपर भ्रष्टाचार या दुर्व्यव्हार के आरोप हों और संसद में दो तिहाई बहुमत से ही उन्हें हटाना संभव था. न्यायविद और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील जगदीप धनकड़ कहते हैं, "अब यह कवच हट जाएगा, हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के लगभग पांच सौ जज हैं और वर्तमान व्यवस्था में इनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार या दुर्व्यव्हार के किसी आरोप की जांच करवा पाना बेहद मुश्किल है". "इसके लिए संसद के रास्ते कार्रवाई करनी पड़ती है. मगर न्यायिक परिषद के गठन से यह रास्ता काफ़ी आसान हो जाएगा और एक आम आदमी के पास एक ज़रिया होगा कि वो न्यायिक परिषद के सामने अपनी शिकायत रख सकेगा और यह उम्मीद कर सकेगा कि उसकी सुनवाई होगी". पारदर्शिता पर सवाल मगर जजों के ख़िलाफ़ जांच चूँकि न्यायिक समुदाय के ज़रिए ही होगी इसलिए कुछ लोगों का मानना है कि यहाँ पारदर्शिता पर सवाल उठ सकते हैं. जजों की शुरु से यह माँग रही है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बरक़रार रखने के लिए कार्यपालिका के दख़ल को दूर रखा जाए. यानी जांच को न्यायिक समुदाय के भीतर रखने की दलील दो धारी तलवार की तरह है. बहरहाल यह विधेयक अभी संसद में लाया जाएगा. फिर उस पर लंबी बहस चलेगी और फिर इसे विशेषज्ञों की समिति को सौंपा जाएगा. यानी न्यायिक प्रणाली में मील का पत्थर कहे जाने वाले इस परिवर्तन को देखने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना होगा. | इससे जुड़ी ख़बरें सुप्रीम कोर्ट जज का रहस्योद्घाटन15 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस भारत में तेज़ सुनवाई अदालतें बनेंगी29 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस हाइकोर्ट के 300 जजों की नियुक्ति शीघ्र20 नवंबर, 2004 | भारत और पड़ोस 'विधेयक नहीं आम सहमति की ज़रूरत'26 सितंबर, 2004 | भारत और पड़ोस न्यायाधीश भगवानदास को लौटना पड़ा30 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस न्याय से ही न्याय के लिए उठते सवाल20 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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