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न्यायाधीश भगवानदास को लौटना पड़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रह चुके राणा भगवानदास को भारतीय अधिकारियों ने यह कहते हुए देश के अंदर आने की इजाज़त देने से इनकार कर दिया कि उनके वीज़ा काग़ज़ात ठीक नहीं हैं. भगवानदास पाकिस्तान के ऐसे पहले हिंदू जज हैं जो देश के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के पद तक पहुँच चुके हैं. जस्टिस भगवानदास पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बाद देश के दूसरे सबसे सीनियर जज हैं. राणा भगवानदास अपने परिवार सहित लाहौर-अमृतसर बस से गुरूवार को वाघा सीमा चौकी पर पहुँचे थे लेकिन उन्हें वापस पाकिस्तान लौटना पड़ा क्योंकि भारतीय आव्रजन अधिकारी उनके काग़ज़ात के बारे में संतुष्ट नहीं हुए. ख़बरों के अनुसार आव्रजन अधिकारियों ने राणा भगवानदास से कहा कि उनके पास लखनऊ का वीज़ा है इसलिए वह अमृतसर होकर वहाँ नहीं जा सकते क्योंकि पंजाब अब भी अशांत क्षेत्र घोषित है. राणा भगवानदास ने बताया कि उनके और उनके परिजनों के पास लखनऊ जाने का वैध वीज़ा है और वह लखनऊ जाने के लिए अमृतसर से ट्रेन में बैठेंगे लेकिन अधिकारियों ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया. अलबत्ता अधिकारियों ने यह कहा कि जस्टिस भगवानदास अकेले लखनऊ जा सकते हैं मगर उन्होंने अकेले जाने से इनकार कर दिया. परिणामस्वरूप जस्टिस राणा भगवानदास और उनके परिजन भारतीय सीमा में दाख़िल हुए बिना ही लौट गए. जस्टिस राणा भगवानदास के भारत में स्वागत के लिए काफ़ी तैयारियाँ की गई थीं और अमृतसर के अनेक न्यायिक अधिकारी उनका स्वागत करने के लिए वाघा सीमा पर आए थे. राणा भगवानदास का स्वागत करने आए अधिकारियों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली में वरिष्ठ अधिकारियों से इस बाबत संपर्क करने की कोशिश की लेकिन कुछ नतीजा नहीं निकला और राणा भगवानदास और उनके परिवार को निराश ही लौटना पड़ा. हालाँकि ख़बरों के अनुसार आव्रजन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बाद में कहा कि उसे नहीं मालूम था कि वह राणा भगवानदास और उनका परिवार है. इस अधिकारी ने पत्रकारों को बताया कि कुछ लोग आए थे जिनके पास अमृतसर जाने के लिए वैध वीज़ा नहीं था इसलिए उन्हें देश में दाख़िल नहीं होने दिया गया. निराशा हुई अमृतसर के स्थानीय प्रशासन ने जस्टिस भगवानदास के ठहरने का इंतज़ाम भी सर्किट हाउस में किया था और उनकी आवभगत की ज़िम्मेदारी एसडीएम गुरवर्यम सिंह को सौंपी गई थी.
उन्होंने भारतीय आव्रजन अधिकारियों को भरोसा दिलाने की काफ़ी कोशिश की कि वह अमृतसर में क़दम रखे बिना लखनऊ कैसे जा सकते हैं और इसके लिए उन्होंने अधिकारियों को हलफ़नामा और ज़रूरी दस्तावेज़ों की कॉपियाँ भी देने की भी पेशकश की. जब अधिकारी संतुष्ट नहीं हुए तो जस्टिस भगवानदास ने शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू के मुक़दमों से संबंधित कुछ किताबें पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार के नाम एक पत्र के साथ सौंप दीं. पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपने स्वर्ण जयंती समारोहों के समय इन काग़ज़ात की माँग की थी. राणा भगवानदास पाकिस्तान के ऐसे दूसरे ग़ैरमुस्लिम हैं जो इस मुक़ाम तक पहुँचे हैं. उनसे पहले एक ईसाई न्यायमूर्ति एआर कोर्नेलियस 1960 से 1968 तक पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश रहे थे. 64 वर्षीय न्यायमूर्ति राणा भगवानदास पाकिस्तान के संवैधानिक क़ानून के बारे में अपने विशेष ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें दोस्ती बस:पंजाब से पंजाब तकभारत और पड़ोस पाकिस्तान के पहले हिंदू मुख्य न्यायाधीश02 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस पाक ने नई पेशकश का स्वागत किया 24 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस सीमापार के ठाकुरों की अनूठी शान11 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस लाहौर से चली बस अमृतसर पहुँची20 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस लेकिन टिकट ख़रीदने वाले नहीं17 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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