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भारत में तेज़ सुनवाई अदालतें बनेंगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति वाईके सब्बरवाल ने कहा है कि देशभर में ऐसी अदालतें तैयार की जाएंगी जो मामलों पर तेज़ी से सुनवाई करके कम समय में ही फैसला सुना सकेंगी. न्यायमूर्ति सब्बरवाल ने उम्मीद जताई कि इससे वर्षों से लंबित पड़े मामलों को निपटाने के काम में तेज़ी आएगी और लोगों को फ़ैसले के इंतज़ार में वर्षों तक इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि इन अदालतों की शुरुआत इस वर्ष न्याय दिवस यानी 26 नवंबर से हो सकती है. न्यायमूर्ति सब्बरवाल ने यह बात जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की 100वीं वर्षगाँठ के अवसर पर बोलते हुए कही. उनके इस प्रस्ताव पर अनुमान के मुताबिक क़रीब डेढ़ हज़ार करोड़ रूपए की लागत आएगी. न्यायमूर्ति ने बताया कि देशभर में क़रीब एक करोड़ 80 लाख मामले मजिस्ट्रेट स्तर की अदालतों में लंबित पड़े हुए हैं. इनमें से एक करोड़ 60 लाख मामले ऐसे हैं जो आपराधिक यानी फौजदारी के हैं. उन्होंने कहा कि ये तेज़ी से सुनवाई करने वाली ये अदालतें तीन वर्ष और उससे ज़्यादा समय से लंबित मामलों की सुनवाई करके इन पर जल्द फ़ैसला सुनाने का प्रयास करेंगी. उन्होंने कहा, "मुझे केंद्र सरकार की ओर से इस नई व्यवस्था पर हो रहे ख़र्च पर कोई संदेह नहीं हैं क्योंकि इससे लंबे समय के लिए आम आदमी को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर न्याय मिलने का दायरा और बढ़ेगा." पिछला प्रस्ताव ग़ौरतलब है कि इससे पहले सुझाए गए एक प्रस्ताव में उन्होंने कहा था कि लोगों को न्याय दिलाने के लिए जो अदालतें मौजूद हैं वे दिन में दो पारियों में सुनवाई करें. हालाँकि न्यायमूर्ति के इस प्रस्ताव का कई वकीलों ने विरोध किया है जिसकी वजह से यह ठंडे बस्ते में पड़ता नज़र आ रहा है. न्यायमूर्ति ने वकीलों से अपील की है कि वो इसका विरोध करने के बजाय इस बारे में फिर से सोचें क्योंकि इससे नए ज़रूरी ढाँचे को तैयार करने पर आने वाला ख़र्च भी बचेगा और लोगों के वर्षों से लंबित पड़े मामलों पर तेज़ी से सुनवाई हो सकेगी. जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के हीरक जयंती समारोह का उदघाटन भारत के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने शुक्रवार को किया था. राष्ट्रपति ने इस मौके पर एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया. | इससे जुड़ी ख़बरें भारत में अहम न्यायिक सुधार05 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस पीड़ित का परिवार भी अपील कर सके: खरे09 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस न्याय व्यवस्था में जनविश्वास बढ़ा: तीस्ता24 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस बिना सुनवाई आधी उम्र कटी जेल में13 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस 'आतंकवाद से लड़ने की इच्छाशक्ति नहीं'02 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'टकराव का कारण है कोर्ट की आलोचना'28 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस क्या आम आदमी पर नज़र है अदालतों की?25 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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