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रविवार, 28 अगस्त, 2005 को 13:14 GMT तक के समाचार
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'टकराव का कारण है कोर्ट की आलोचना'

हरीश साल्वे
हरीश साल्वे का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को ठीक तरह से समझा नहीं गया
क़ानूनविद् और पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे का कहना है कि लोकतंत्र के दो स्तंभों, न्यायपालिका और विधायिका के के बीच टकराव का मुख्य कारण है सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की जगह सुप्रीम कोर्ट की आलोचना.

उन्होंने कहा कि कोई भी यह नहीं कह रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में ग़लत क्या है लेकिन हर कोई इस फ़ैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट की आलोचना कर रहा है.

जबकि सांसद मोहम्मद सलीम का कहना था कि आलोचना सुप्रीम कोर्ट की नहीं, उसके फ़ैसले की ही की जा रही है.

बीबीसी हिंदी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'आपकी बात बीबीसी के साथ' में लोकसभा सदस्य और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य मोहम्मद सलीम और भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे श्रोताओं के सवालों के जवाब दे रहे थे.

संसद
संसद में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद आरक्षण के लिए क़ानून बनाने की बात की गई है

हरीश साल्वे ने एक श्रोता के सवाल के जवाब में आरोप लगाया कि संसद सदस्यों ने आरक्षण के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला पढ़ा नहीं है और वे इस पर सवाल उठा रहे हैं.

इस पर तीखा जवाब देते हुए संसद सदस्य सलीम ने कहा, "देश में कुछ लोगों को लगता है कि उन्होंने ही पांडित्य और अक्लमंदी का ठेका ले रखा है, हम इसे ब्राह्मणवाद कहते हैं और इसके ख़िलाफ़ हैं."

हरीश साल्वे ने कहा कि उनकी राय में कई महत्वपूर्व मसलों पर संसद और न्यायालय की राय एक जैसी है.

उन्होंने कहा, "प्रवेश परीक्षा, रेगुलेटरी अथॉरिटी, कैपिटेशन फ़ीस और मेरिट सभी पर संसद और सुप्रीम कोर्ट की राय एक जैसी है और दोनों की इसे आवश्यक मानते हैं."

अमीर-ग़रीब

एक सवाल के जवाब में हरीश साल्वे ने कहा कि यह कहना आसान है कि अदालतें सिर्फ़ अमीरों के लिए रह गई हैं.

मोहम्मद सलीम
मोहम्मद सलीम का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से अमीर और ग़रीब के बीच खाई बढ़ेगी

उन्होंने सवाल उठाया, "एक बच्चे को मेडिकल में पढ़ाने का ख़र्च दो लाख रुपए है और इस हिसाब से सौ बच्चों का ख़र्च दो करोड़ होगा तो आख़िर ये ख़र्च कहाँ से आएगा, ख़ासकर उन शिक्षण संस्थानों के पास जो सरकार से कोई सहायता नहीं लेते."

उन्होंने कहा कि सवाल ये था कि इसके लिए रास्ता निकाला जाए लेकिन यह अनुसूचित जाति और जनजाति के रुप में कैसे ले लिया गया वे समझ नहीं पा रहे.

लेकिन इसके जवाब में मार्क्सवादी नेता सलीम ने कहा कि यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें जिसके बाप के पास पैसा होगा वो तालीम ख़रीदकर दे सकेगा.

उन्होंने पूछा, "आख़िर पिछड़े वर्ग के, अनुसूचित जाति के और अनुसूचित जनजाति के ग़रीब बच्चों को आला तालीम की ज़रुरत है या नहीं."

ग़रीबों के लिए अदालत के सवाल पर हरीश साल्वे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला माफ़िया के लिए नहीं है और यह कोई भावुकता का सवाल भी नहीं है.

उन्होंने कहा कि कोर्ट ने कहा कि सरकार निजी कॉलेजों के लिए क़ानून बनाए और ग़रीब बच्चों के लिए सरकार कॉलेज खोले.

जबकि सलीम का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने जो फ़ैसला दिया है उससे शिक्षा का व्यावसायीकरण बढ़ेगा.

उन्होंने कहा, "जो फ़ैसला आया है वह ठीक नहीं है, सबको साथ लेकर चलना होगा वरना अमीर ग़रीब का फ़ासला बढ़ेगा."

जवाबदेही

एक सवाल के जवाब में संसद सदस्य सलीम ने कहा कि लोकतंत्र मज़बूत रहे तभी न्यायपालिका काम कर पाएगी और इसका रास्ता एक ही है कि संविधान के रास्ते पर चलें.

 हमारी संसद के साथ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है लेकिन जब तक संविधान क़ायम है अदालतों की जवाबदेही बनी रहेगी
हरीश साल्वे

मोहम्मद सलीम का कहना था कि यदि हम (संसद सदस्य) ग़लती करते हैं तो हमें हर पाँच साल में एक बार फिर जनता के पास जाना होता है.

जवाबदेही सवाल पर हरीश साल्वे ने कहा कि यह कहना ग़लत है कि अदालतें किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होतीं.

उन्होंने कहा, "हमारी संसद के साथ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है लेकिन जब तक संविधान क़ायम है अदालतों की जवाबदेही बनी रहेगी."

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