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असली मर्द की पहचान क्या है? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'असली मर्द की यही पहचान, जो करे पत्नी का सम्मान.' इसी नारे के साथ भारत में पुरुषत्व की परिभाषा बदलने की कोशिश की जा रही है ताकि तेज़ी से फ़ैलते यौन रोगों के बारे में जानकारी का स्तर बढ़ाया जा सके. इस काम में कई स्वयंसेवी संगठन एक साथ लगे हुए है और इन्हीं प्रयासों के तहत 'यारी-दोस्ती' नामक एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई है जिसके तहत 16 से 24 वर्ष के लड़कों के साथ मेलजोल बढ़ाकर उनकी पुरुषवादी मानसिकता बदलने की कोशिश हो रही है. 'यारी-दोस्ती' कार्यक्रम के निदेशक रवि वर्मा कहते हैं, "हमारे समाज में लड़के को शुरु से ही अलग किस्म का ट्रीटमेंट दिया जाता है. उसमें प्रतिस्पर्धा की भावना जगाई जाती है. उसे गुड़िया से खेलने नहीं दिया जाता. कहा जाता है कि मर्द रोता नहीं. हम इस मानसिकता को बदलने की कोशिश कर रहे हैं." तो फिर मर्दानगी की नई परिभाषा क्या होगी. यारी-दोस्ती कार्यक्रम के तहत अपने ही शब्दों में 'मवाली' शरीफ़ बने मुंबई के सूर्यकांत कहते हैं, "असली मर्द वो है जो सभी को साथ लेकर चले. औरतों का सम्मान करें. परिवार का सम्मान करे. यौन रोगों के बारे में स्त्री की भी सुने. उनपर अधिकार न जमाए." ज़रूरत असल में महिलाओं के स्वास्थ्य और एचआईवी के क्षेत्र में 'पॉपुलेशन काउंसिल', 'कोरो', 'मेसवा' जैसे कई संगठन काम कर रहे थे लेकिन उन्होंने अपने शोध में पाया कि यौन रोगों की जागरुकता के रास्ते में पुरुषों की मानसिकता भी आड़े आती है. इसके बाद उन्होंने शुरुआत की 'यारी-दोस्ती' की. कार्यक्रम के निदेशक रवि वर्मा के अनुसार पुरुषों को लगता है कि वो सबकुछ जानते हैं और उनकी यही प्रवृत्ति समस्या की जड़ थी. अब मुंबई और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर क्षेत्र में 'यारी-दोस्ती' का कार्यक्रम चलाया जा रहा है जिसमें संगठन के अनुसार क़रीब 550 युवक जुड़े हुए हैं. कार्यक्रम को चलाने में दिक्कतें भी आ रही हैं जिसके बारे में रवि वर्मा कहते हैं कि कई मामलों में युवकों के परिवारजन ही सवाल खड़े करते हैं और कहते हैं कि मर्दों को स्त्रियों की तरह बनाने की कोशिश की जा रही है. आसान नहीं बदलना ज़ाहिर है बदलाव आता है तो विरोध होता ही है. भारत के शहरों में पुरुषों के चरित्र में कहीं-कहीं पर कुछ बदलाव तो हुए हैं. मसलन, अब कामकाजी पति अपनी बीवी की दिक्कतों को समझता है. हाथ बँटाता है. यौन समस्याओं पर खुलकर बात करता है. शायद यही सबकुछ गांवों में भी किए जाने की कोशिश हो रही है जिसका विरोध हो रहा है क्योंकि बात यौन रोगों तक सीमित नहीं है. भारत जैसे पितृ सत्ता केंद्रित समाज में पुरुष की पारंपरिक मानसिकता पर सवाल उठाना विरोध को आमंत्रित तो करेगा ही. हालांकि संगठन को पूरा विश्वास है कि आने वाले दिनो में स्थिति ज़रुर बदलेगी. | इससे जुड़ी ख़बरें 'फ़ेयर ऐंड हैंडसम' बनाने वाली क्रीम03 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस मर्द भी हैं देह व्यापार के बाज़ार में15 सितंबर, 2004 | भारत और पड़ोस अजमेर में औरतों की इबादत पर विवाद15 जून, 2006 | भारत और पड़ोस 'हम पहले भारतीय हैं, औरत मर्द बाद में'14 सितंबर, 2004 | भारत और पड़ोस पुरुषों के आभूषणों का चलन | भारत और पड़ोस मर्दानगी दिखाने की चाहत | भारत और पड़ोस दो पुरुषों की प्रेमकथा... | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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