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'हम पहले भारतीय हैं, औरत मर्द बाद में' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पुनीता अरोड़ा भारतीय सेना में लेफ़्टिनेंट जनरल के ओहदे तक पहुँचने वाली पहली महिला हैं, लेफ़्टिनेंट जनरल सेना में जनरल के बाद सबसे बड़ा पद है. पुणे स्थित सशस्त्र सेना चिकित्सा कॉलेज की कमांडेट पुनीता अरोड़ा ने अपने 36 साल के कार्यकाल में कई सम्मान हासिल किए हैं. बीबीसी की जयश्री बजोरिया के साथ बातचीत में उन्होंने अपनी ज़िंदगी के कई पहलुओं के बारे में बताया. अपने बचपन के बारे में कुछ बताएँ? मैं पैदा हुई थी अविभाजित इंडिया के लाहौर शहर में. केवल एक साल की थी जब मैं लाहौर से अपने माता-पिता के साथ हिन्दुस्तान आई.
जब हम वहाँ से आए तो सब कुछ वहीं पर छोड़ कर आए थे. मेरी माँ चार बच्चों, एक कंबल और एक पानी पीने का गिलास लेकर घर से चली. हम लोग सहारनपुर में आकर रूके तो लगभग एक साल तक उसी तरह रहे. शरणार्थियों की तरह खाना-पीना. मेरे पिताजी फौज में थे इसलिए उन्हें अपनी नौकरी वापस मिल गई. धीरे-धीरे परिवार के बाकी लोगों को भी जहाँ-जहाँ नौकरी मिली वो चले गए. मेरे माता-पिता का बस एक ही लक्ष्य था कि बच्चों को अच्छी से अच्छी तालीम देनी है. क्या आप हमेशा से फौज में आना चाहती थीं? बिल्कुल नहीं. बचपन से तो ये दिमाग में भी नहीं था कि मैं फौज में आऊँगी. डॉक्टर बनना है ये ज़रूर थी ललक, लेकिन फौज में डॉक्टर बनना है, ये तो था भी नहीं. लेकिन एक बार जब यहाँ आई तो उसके बाद कभी अफ़सोस नहीं किया. आप पहली महिला है जो आर्म्ड फोर्स मेडिकल कॉलेज की भी प्रमुख बनी हैं. तो ये कैसा लग रहा है? देखिए, मैं पहली महिला हूँ, ये बात तो मेरे दिमाग में अब तक आई भी नहीं है, क्योंकि जब मैं फौज में आई तब एएफएमसी को-एड कॉलेज था, तो कभी यहाँ छात्रों में भेदभाव नहीं होता था कि ये लड़का या लड़की है, इतना ज़रूर है कि उनके होस्टल अलग-अलग हैं. लेकिन कभी महसूस भी नहीं हुआ कि हम लड़की हैं और लड़कों के साथ पढ़ रहे हैं. लेकिन आपको ये तो मानना ही पड़ेगा कि आप पहली महिला हैं जो लेफ्टिनेंट जनरल के ओहदे तक पहुँची हैं, फौज में और ऐसा पहले नहीं हुआ है. ये पहले भी हो सकता था, कोई ऐसी बड़ी बात नहीं है. पहले तो आप देखो कि कितनी कम महिलाएँ फौज में आती है, माता-पिता तो पहले ही सोचेंगे कि बेटी को फौज में डालना- नहीं-नहीं. दूसरा फिर ये भी दिल में रहता है कि शादी हो जाएगी. अगर उसका पति फौज में हो फिर भी पता नहीं कि पोस्टिंग इकट्ठी होगी कि नहीं, फौज में पोस्टिंग इकट्ठी भी हो गई, तो कोई अस्थाई कार्य आ जाएगी, तो अक्सर हमारी महिलाएँ इतना ज्यादा एडजस्ट नहीं कर पाती. तो कितनी आती हैं. लेकिन बीच-बीच में छोड़ जाती हैं. आपने कहा कि फौज में औरतों के साथ कोई भी पक्षपात नहीं होता, लेकिन आज भी भारतीय फौज में महिलाओं को संघर्ष वाली जगहों पर तैनात नहीं किया जाता जब कि दूसरे देशों में ऐसा शुरू हो चुका है. तो क्या आपको लगता है कि भारतीय महिलाएँ अपने देश के लिए लड़ने के क़ाबिल नहीं है? नहीं-नहीं ऐसा नहीं है. वो बहुत ही क़ाबिल है. डॉक्टर तो आज से 60-70 साल से हैं आर्मी कोर में मगर कॉम्बैट कोर में जो हमारी महिलाएँ हैं उन्होंने वहाँ 10 साल से आना शुरू किया है. शायद दस साल भी ना हुए हो. हो सकता है धीरे-धीरे नियम भी बदल जाए. अभी तो केवल दस साल हुए हैं. देखते हैं आगे क्या होता है. जम्मू में आप कालूचक में जब पोस्टेड थी तब वहाँ एक आतंकवादी हमला हुआ था, सिर्फ उस हमले के बारे में ही नहीं, जम्मू की जो मेरी पोस्टिंग थी उसने मुझे हमारे फौजियों का जो असल दुःख, दर्द, परेशानियाँ है से रू-ब-रू कराया. सिर्फ कालूचक ही नहीं, रघुनाथ मंदिर पर हमला हुआ तो उसके हताहत भी हमारे पास आए थे, फिर ऊपर से गोलीबारी होती थी तो उसके हताहत आते थे, तो दो-दो, चार-चार तो आते ही रहते थे. फ़ौज में आप कोई बदलाव देखना चाहेंगी, कुछ बदलाव लाना चाहेंगी? हम तो फौज में मेडिकल कोर में से आते हैं. बाकी फौज की देखभाल करने के लिए तो बहुत लोग हैं. सबका लक्ष्य एक ही है कि हम अपने मरीज़ों को अच्छा से अच्छा इलाज दे सके, क्योंकि हमारे जो फौजी है, उनकी ज़िंदगी बहुत मुश्किल है. ये तो आपको मानना ही पड़ेगा. आपको लगता है कि वक्त आ गया है कि भारतीय फौज में महिलाओं को एक अलग मुक़ाम हासिल करने का मौका मिलेगा? मैंने कभी आज तक ये सोचा भी नहीं कि एक पुरूष और एक महिला और दोनों फौज में. लेकिन आप लोगों ने कह-कह कर मुझे इसका एहसास दिलवा दिया है. फौज में कोई भी आए, हम सब हिन्दुस्तानी है- चाहे औरत हो चाहे पुरूष हो. |
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