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शुक्रवार, 08 सितंबर, 2006 को 08:09 GMT तक के समाचार
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बाग़ी विधायकों की सुप्रीम कोर्ट में अपील

झारखंड विधानसभा
झारखंड की राजनीति फिलहाल तकनीकी गुत्थियों मे उलझी हुई है
झारखंड में अर्जुन मुंडा सरकार के तीन बाग़ी विधायकों ने विधानसभा स्पीकर के नोटिस के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है.

विधानसभा स्पीकर इंदर सिंह नामधारी ने विभिन्न मामलों में तीन बागी विधायकों एनोस सिक्का, कमलेश सिंह और स्टीफन मरांडी को नोटिस जारी कर दिए थे जिसके बाद से तीनों विधायकों की सदस्यता पर ख़तरा मंडराने लगा था.

इन तीनों विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करके कहा है कि जब तक 15 सितंबर को विधानसभा में शक्ति परीक्षण नहीं हो जाता तब तक स्पीकर कोई फैसला न करें.

कोर्ट में कमलेश सिंह और स्टीफन मरांडी का पक्ष रखने वाले वकील समित गोराडिया ने कहा कि चूंकि अब मामला अदालत में है और अदालत ने सोमवार को समय दिया है इसलिए उम्मीद है कि स्पीकर कोई फ़ैसला नहीं करेंगे.

मैंने तो केवल नोटिस दिया है. कोई फ़ैसला नहीं. ये लोग रस्सी को सांप क्यों समझ रहे हैं. मेरे पास मामला आया तो मैंने नोटिस दे दिया. क्या ये मेरा हक़ नहीं.''
इंदर सिंह नामधारी

स्पीकर नामधारी ने भी तीनों विधायकों को सोमवार को ही बुलाया था.

मामला कोर्ट में आने के बाद नामधारी का रवैया थोड़ा नरम दिखा और उन्होंने कहा,'' मैंने तो केवल नोटिस दिया है. कोई फ़ैसला नहीं. ये लोग रस्सी को सांप क्यों समझ रहे हैं. मेरे पास मामला आया तो मैंने नोटिस दे दिया. क्या ये मेरा हक़ नहीं.''

कमलेश सिंह और एनोस सिक्का का मामला तक़रीबन एक जैसा है. कमलेश सिंह एनसीपी के हैं और एनसीपी आधिकारिक रुप से यूपीए गठबंधन का घटक है जबकि कमलेश सिंह एनडीए को समर्थन दे रहे थे.

इसी तरह एनोस सिक्का की पार्टी ने पत्र लिखकर यूपीए को समर्थन की बात कही थी जबकि पार्टी के एकमात्र विधायक सिक्का एनडीए के साथ चले गए थे.

स्टीफन मरांडी को इस आधार पर स्पीकर का नोटिस मिला है कि उन्होंने निर्दलीय विधायक होते हुए झारखंड विकास मोर्चा नामक पार्टी बनाई. लेकिन वो कहते हैं कि झारखंड विकास मोर्चा अब भी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं बल्कि विकास के मामले उठाने का मंच मात्र है.

इस पूरी क़वायद से स्पष्ट है कि अब तकनीकी गुत्थियों के ज़रिए झारखंड की सियासत पर कब्ज़ा करने की कोशिशें हो रही हैं.

ऐसे में झारखंड की जनता के लिए स्पीकर इंदर सिंह नामधारी मशहूर कवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां मात्र दोहराते हैं-

व्यर्थ है पूछना था दोष किसका
खुला था पहले गरल का कोष किसका
ज़हर से ज़हर अब तो धुल रहा है
हलाहल से हलाहल धुल रहा है

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