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'संस्कृत के विद्वान अर्थ तय करें' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष कल्बे सादिक़ ने वंदे मातरम् विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि संस्कृत और इस्लाम के विद्वानों को एक साथ बैठकर वंदे मातरम् का अर्थ तय करना चाहिए. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि अगर वंदे मातरम् का अर्थ मातृभूमि को सलाम करना या उसकी प्रशंसा करना है तो मुसलमानों को कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए. उनका कहना है कि अगर इसका अर्थ पूजा या इबादत से है तो मुसलमानों को इस पर एतराज़ होना स्वाभाविक है क्योंकि इस्लाम साफ़ शब्दों में बताता है कि अल्लाह को छोड़कर किसी और की पूजा नहीं की जा सकती. शियाओं के वरिष्ठ धर्मगुरू कल्बे सादिक़ ने कहा कि शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए 7 सितंबर को मुसलमान बच्चे स्कूल ज़रूर जाएँ और वहाँ प्रार्थनाओं में हिस्सा लें और वे वहाँ 'वंदे' शब्द के बिना ही राष्ट्र गीत गा सकते हैं. उन्होंने अपनी 'निजी राय' व्यक्त करते हुए कहा, "वंदे मातरम् कोई अहम या बड़ा मुद्दा नहीं है, उससे बड़ा मुद्दा तो अशिक्षा का है जिसकी वजह से कई बार मुसलमान गुमराह हो जाते हैं." उन्होंने कहा कि वे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष राबे हसन नदवी से बातचीत करके एक संयुक्त बयान देना चाहते थे लेकिन मौलाना नदवी के शहर से बाहर होने के कारण बातचीत नहीं हो पाई. मौलाना सादिक़ ने कहा कि इस मुद्दे से भारतीय जनता पार्टी कोई फ़ायदा नहीं उठा पाएगी क्योंकि लोग बहुत समझदार हो गए हैं. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली कई राज्य सरकारों ने सरकारी स्कूलों में वंदे मातरम् के गायन को अनिवार्य करने की घोषणा की है लेकिन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री संसद में एक बयान देकर स्पष्ट कर चुके हैं कि वंदे मातरम् का गायन किसी के लिए कोई बाध्यता नहीं है. |
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