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दो महिलाओं की मौत की सज़ा बरक़रार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने दो महिलाओं को नौ बच्चों के अपहरण और फिर उनकी हत्या करने का दोषी पाते हुए उनकी मौत की सज़ा को बरक़रार रखा है. आरोप हैं कि ये महिलाएँ इन बच्चों को चोरी और डकैती के कामों के लिए इस्तेमाल करती थीं. इससे पहले महाराष्ट्र की एक निचली अदालत इन महिलाओं को मौत की सज़ा सुना चुकी थी पर इन महिलाओं ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुंबई हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. हाईकोर्ट ने इस याचिका को ख़ारिज करते हुए निचली अदालत के फ़ैसले को सही ठहराया था जिसके बाद इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. इस अपील को भी सुप्रीम कोर्ट में दो न्यायाधीशों की पीठ ने सुनवाई के बाद ख़ारिज कर दिया और हाईकोर्ट और निचली अदालत के फ़ैसले को सही बताया. 'जघन्य अपराध' सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इन महिलाओं ने जो अपराध किया है उसमें किसी भी तरह की राहत देने का प्रश्न ही नहीं उठता है. ग़ौरतलब है कि बच्चों के अपहरण और हत्या के मामले में इन दोनों महिलाओं के अलावा इनकी माँ को भी सज़ा सुनाई गई थी. इन महिलाओं की माँ की पहले ही हिरासत में मौत हो चुकी है. पुलिस ने बताया है कि इन बच्चों का अपहरण वर्ष 1994-96 के दौरान हुआ था. इन बच्चों में से केवल सात बच्चों के ही शव बरामद किए जा सके. | इससे जुड़ी ख़बरें बलात्कार के मामले में सांसद को जेल12 मई, 2006 | भारत और पड़ोस परिवार के पाँच लोगो को ज़िंदा जलाया05 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस 'बिठलाहा' के ज़रिए आदिवासी न्याय10 मई, 2005 | भारत और पड़ोस बच्चों में बढ़ रही है आपराधिक प्रवृत्ति04 जून, 2004 | भारत और पड़ोस शहाबुद्दीन ने समर्पण किया | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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