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शनिवार, 26 अगस्त, 2006 को 10:36 GMT तक के समाचार
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हज का सफ़र साइकिल के ज़रिए

हज यात्री
साइकिल पर हज यात्रा पर जाने वाले सभी लोग पूरी तैयारी से जा रहे हैं
एक ज़माना था कि जब भारत से हज करने वालों के क़ाफ़िले काफ़ी पहले ही अपने अपने घरों से विदा ले लेते थे क्योंकि उन्हें हज़ारों मील की यह पवित्र यात्रा पैदल या फिर ऊंटों की पीठ पर या फिर कश्तियों से तय करनी पड़ती थी.

ज़माना बदला, पहले जलयान आए और फिर विमानों ने तो दूरी को चंद घंटों में समेट कर रख दिया.

लेकिन अब भी कुछ लोग ऐसे हैं जो इस सफ़र को उसके पुराने अंदाज़ में तय करना चाहते हैं.

इसी पुराने ज़माने की याद ताज़ा करते हुए भारत के हैदराबाद शहर से सात हज यात्रियों का एक दल साइकिलों पर मक्का की ओर रवाना हुआ है.

इस दल के सदस्यों में मोहम्मद हनीफ़, शेख़ बुरहान क़ादरी, शमशेर ख़ान, अब्दुल क़ादिर, यूसुफ़ ख़ान, मोहम्मद ख़्वाजा और शेख़ रफ़ीक़ शामिल हैं.

यह दल जिस में शामिल अधिकतर लोगों की उम्र साठ बरस या उससे अधिक है जो इस बात का सबूत है कि बुढ़ापा बुलंद और पुख़्ता इरादों के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकता है.

 हम पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, इराक़ और कुवैत से होते हुए सऊदी अरब पहुंचने का इरादा रखते हैं और हमें यक़ीन है कि अल्लाह की मदद से हम यह सफ़र आसानी से पूरी कर लेंगे
शेख़ बुरहान क़ादरी

60 वर्षीय मुहम्मद हनीफ़ के नेतृत्व में यह दल अब तक 300 किलोमीटर का सफ़र तय कर चुका है और आंध्रप्रदेश के बाद अब महाराष्ट्र में प्रवेश कर गया है. दिल्ली और अमृतसर होते हुए वाघा के रास्ते यह दल पाकिस्तान में दाख़िल होगा.

दल के एक सदस्य शेख़ बुरहान क़ादरी का कहना था, '' हम पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, इराक़ और कुवैत से होते हुए सऊदी अरब पहुंचने का इरादा रखते हैं और हमें यक़ीन है कि अल्लाह की मदद से हम यह सफ़र आसानी से पूरा कर लेंगे.''

रोज़ाना 50 किलोमीटर यात्रा करने वाले इस दल के सातों सदस्य आटो रिक्शा चालक हैं.

दल के एक सदस्य मोहम्मद हनीफ़ कहते हैं कि ‘मुश्किलों का क्या है, वे आएंगी ही. हमारा काम सब्र करना है और अल्लाह से दुआ करना है.’

आगे आए लोग

ये लोग पहले एक दूसरे को नहीं जानते थे, लेकिन जैसे ही मुहम्मद हनीफ़ के इरादे की ख़बर फैली ये लोग भी एक एक करके उनका साथ देने के लिए आ गए.

 मुश्किलों का क्या है, वे आएंगी ही. हमारा काम सब्र करना है और अल्लाह से दुआ करना है
मोहम्मद हनीफ़, एक यात्री

यही नहीं बल्कि कई दूसरे लोगों ने भी इसमें इन लोगों की मदद की और उनके लिए नई साइकिलों का इंतज़ाम किया.

मुहम्मद हनीफ़ कहते हैं कि उन्हें इस सफ़र का विचार इसलिए आया कि इससे पहले बिहार और उड़ीसा के एक एक हज यात्री ने यह सफ़र पैदल ही पूरा किया था.

उसके बाद 1984 में कटक उड़ीसा के 60 वर्षीय मुहम्मद फ़ज़ल ने भी इसी प्रकार हज यात्रा की थी.

मुहम्मद हनीफ़ और उनके दल के सदस्यों को आशा है कि वे यह सफ़र तीन वर्षों में पूरा कर लेंगे और 2008 या 2009 में वे हज का फ़र्ज़ अदा कर लेंगे.

यह दल इस मामले में कितनी हिम्मत और विश्वास से भरा हुआ है, इसका अंदाज़ा इस बात से होता है कि उनके यात्रा के सामान में कफ़न भी रखा है कि अगर रास्ते में किसी के साथ कोई दुर्घटना हो जाती है तो दल के दूसरे सदस्य उन्हें वहीं दफ़न करके अपना सफ़र जारी रखेंगे.

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