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गुरुवार, 03 अगस्त, 2006 को 22:31 GMT तक के समाचार
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इस बार तोप नहीं चला सकी फ़ौजिया

फ़ौजिया
फ़ौजिया अपने पिता की चाय की दूकान पर हाथ बँटाती है
दुनिया भर में मशहूर, महान सूफ़ी संत ख्व़ाजा मोइनुद्दीन चिस्ती का 794वाँ उर्स लाखों श्रद्धालुओं के लिए इबादत और ख़ुदा की नियामत का मौका लेकर आया.

लेकिन अजमेर की 26 वर्षीया फ़ौजिया ख़ान के लिए यह उर्स उतना मुबारक़ नहीं रहा क्योंकि इस बार उसे उर्स शुरू होने पर तोप चलाने की परंपरा से वंचित कर दिया गया.

फ़ौजिया कहती हैं कि उनके चचेरे भाईयों में अनबन की वज़ह से उसे तोप नहीं चलाने दी गई.

लेकिन उसके पिता मोहम्मद हनीफ़ कहते हैं फ़ौजिया के लड़की होने की वजह से उसे रोक दिया गया.

उर्स शुरु होते ही तोप की गर्जना से ज़ायरीन और हर आम-ओ-ख़ास को इत्तिला करने की परंपरा सैंकड़ों साल पुरानी है.

पिछले 18 साल से फ़ौजिया ही यह काम कर रही हैं. मगर इस बार उसे मन मसोस कर रह जाना पड़ा.

इससे मायूस और हैरान फ़ौजिया कहती हैं कि उसके रिश्तेदारों ने उर्स के मौके पर साफ़ कह दिया कि इस बार चाहें उसके लिए वालिद तोप चला लें. कोई भी यह काम करे, लेकिन फ़ौजिया नहीं.

"एक माह बाद चाहे फ़ौजिया को यह अवसर मिल जाए. लेकिन अभी नहीं."

फ़ौजिया के परिजनों का कहना है कि दरअसल मीडिया में लगातार उसका प्रचार होने से चचेरे भाईयों को ईर्ष्या हो गई.

फ़ौजिया कहती हैं कि 786वें उर्स के वक्त उसको ज़बरदस्त शोहरत मिली थी.

पुरानी परंपरा

यह परिवार पिछले सैंकड़ों सालों से तोप चलाने की परंपरा का निर्वाह करता रहा है.

परिवार में वृद्धि हुई तो पारी तय कर दी गई. लेकिन अपनी गहरी दिलचस्पी और पिता की ढलती उम्र ने फ़ौजिया को तोप चलाने का ऐसा मौका दिया कि गत 18 वर्ष से वो इसे अंजाम देती रही.

उर्स के अलावा साल भर में 252 बार ये तोप चलाई जाती है.

 मैंने इसे बहुत नाज़-प्यार से पाला है. इस बार उसे तोप चलाने से रोक कर अच्छा नहीं किया. मैं ज़िंदगी भर ऐसे लोगों को माफ़ नहीं करूंगा
हनीफ़, फ़ौजिया के पिता

दुबली पतली फ़ौजिया 35 किलोग्राम की तोप लेकर दरगाह क्षेत्र में ऊँचाई पर जाती और बड़ी कुशलता से इसे चलाकर लौट आती.

दरगाह कमेटी से उन्हें 800 रुपए तोप चलाने का मिलता है. इसमें बारूद का खर्च भी शामिल है.

फ़ौजिया के पिता मोहम्मद हनीफ कहते हैं कि उन्होंने फ़ौजिया को कभी बेटी नहीं समझा. उसे बेटे की तरह पाला पोसा और फ़ौजिया खुद भी एक बेटे की तरह काम करती है.

फ़ौजिया के पिता बीमार रहने लगे तो उसने ही तोप चलाने का काम हाथ में ले लिया.

अपनी लाडली बेटी को तोप चलाने से वंचित करने पर हनीफ बहुत दुखी थे. वे कहते हैं, मैंने इसे बहुत नाज़-प्यार से पाला है. इस बार उसे तोप चलाने से रोक कर अच्छा नहीं किया. मैं ज़िंदगी भर ऐसे लोगों को माफ़ नहीं करूंगा."

फ़ौजिया अपने पिता की चाय की दुकान में भी मुस्तैदी से हाथ बंटाती हैं. फ़ौजिया को उम्मीद है ख्वाज़ा साहब आईंदा उसे ही तोप चलाने का मौका देंगे.

फ़ौजिया के परिजन कहते हैं यह एक तरह की इबादत है. उन्हें इससे बड़ा सुकून मिलता है.

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