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मन्नत माँगने सभी आते हैं यहाँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सूफी संतों की शान में गाई जा रही कव्वाली, रंग-बिरंगी कशीदाकारी से झिलमिलाती चादरें, लाल गुलाब की पंखुड़ियाँ और दुआ के लिए उठते हजारों हाथ. ये दृश्य शायद किसी भी दरगाह का हो सकता है लेकिन फर्क ये है कि हरिद्वार के पास कलियर शरीफ़ में दुआ माँगने वालों में सिर्फ़ अल्लाह के बंदे ही नहीं बल्कि राम की पूजा करने वाले और वाहे गुरू का नाम जपने वाले भी होते हैं. पिछले रविवार से यहाँ शुरू हुए 736वें उर्स में देश-विदेश से क़रीब 15 लाख लोग शामिल हो रहे हैं. कलियर शरीफ़ का इतिहास लगभग 850 साल पुराना है. महान सूफी संत बाबा फ़रीदुद्दीन गंजशंकरी ने अपने भांजे मख़दून अली अहमद को आदेश दिया था कि वो कलियर जाकर लोगों की ख़िदमत करें. कहा जाता है कि अली अहमद ने लगातार 12 साल तक लंगर पकाया और लोगों को खिलाया लेकिन ख़ुद उसमें से कुछ भी नहीं खाया. उनकी इस सेवा से प्रभावित होकर बाबा फ़रीद ने उन्हें साबिर (सब्र करने वाला) नाम दिया. यहाँ के एक सूफ़ी संत मंज़र एजाज़ के अनुसार, "साबिर साहब बहुत बड़े सूफी संत थे. इनकी बड़ी करामातें हैं. लोगों की मन्नतें यहाँ आकर पूरी हो जाती हैं.” कोई यहाँ अपनी फ़रियाद लेकर आता है तो कोई शुक्रिया अदा करने. अमृतसर से परिवार के साथ आए, सिर पर टोपी पहने रवींद्र कुमार बताते हैं, "कुछ समय पहले हमने अपने बेटे की नौकरी लग जाने की मन्नत मांगी थी और उसकी नौकरी लग गई इसलिए हम यहाँ चादर चढ़ाने आए हैं.” चलने का सहारा कुछ ऐसी ही कहानी सहारनपुर के इस्लाम अहमद की है. वो कहते हैं, "मैं यहाँ बैसाखी के सहारे आया था. मेरे दोनों पैर जलकर सट गये थे. दिल्ली के सफदरजंग के डॉक्टरों तक ने जवाब दे दिया था. तब मैं यहाँ आया और साबिर साहब की मेहरबानी से आज मैं दौड़ सकता हूं.”
मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के समय से दरगाह की देखरेख की ज़िम्मेदारी साबरी परिवार के पास है और इसी परिवार का बड़ा बेटा पीढ़ी दर पीढ़ी यहाँ गद्दीनशीं होता है. मौजूदा सज्जादा नशीं मंसूर एजाज़ साबरी कहते हैं, "वैसे तो हर धार्मिक जगह के लिए कहा जाता है कि किसी भी मज़हब के लिए कोई बंदिश नहीं है लेकिन शायद ये सिर्फ़ कहने के लिए होता है. इसकी सच्ची मिसाल सिर्फ़ कलियर शरीफ़ ही है." "ये खुला दरबार है और अगर देखें तो यहाँ आने वालों में ग़ैर मुसलमान ही ज़्यादा होते हैं.” कलियर शरीफ़ में हर साल होने वाले उर्स में देश-विदेश से लाखों लोग आते हैं जिनमें पाकिस्तान से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या सबसे ज़्यादा होती है. मेंहदी डोरी की रस्म से शुरू होने वाले उर्स का मुख्य आकर्षण छोटी रोशनी, बड़ी रोशनी और कव्वाली होती है. |
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