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स्कूलों में जीवों की चीरफाड़ पर पाबंदी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मध्य प्रदेश के शिक्षा बोर्ड ने राज्य के सभी स्कूलों में वैज्ञानिक प्रयोग के लिए जानवरों को मारने पर पाबंदी लगा दी है. बोर्ड का कहना है कि यह क़दम जीवों के प्रति विद्यार्थियों को और संवदेनशील बनाने के लिए उठाया गया है. शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष यूके सामल का कहना था कि जीवविज्ञान पढ़नेवाले छात्र जीवों की चीरफाड़ करते हैं जो उनके प्रति क्रूरता है. उनका कहना था कि स्कूलों में जीवित जीवों की चीरफाड़ की जाती है जबकि मेडिकल कॉलेजों में भी ऐसा नहीं किया जाता है. बोर्ड ने स्कूलों को एक पत्र भेजा है और कहा है कि जीवविज्ञान के छात्रों की प्रयोगात्मक कक्षाओं में जीवों को मारना तुरंत बंद करा दिया जाए. इसके बदले विद्यार्थियों को आंतरिक अंगों की जानकारी देने के लिए स्कूल चार्ट, मॉडल, कंप्यूटर सीडी आदि का इस्तेमाल करें. जीवविज्ञान पढ़नेवाले छात्र आंतरिक अंगों की जानकारी हासिल करने के लिए मेढ़क, तिलचट्टा और झींगा मछली का विच्छेदन करते हैं. विरोध लेकिन जीव अधिकारों के पक्षधर इसका विरोध करते आए हैं. उनका कहना है कि यह क्रूरता है और प्रयोगात्मक जानकारी के नाम पर बड़ी संख्या में जीवजन्तु मारे जाते हैं. उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में ही सरकारी स्कूलों में विज्ञान पढ़नेवाले विद्यार्थियों की संख्या लगभग दो लाख है. केंद्रीय शिक्षा बोर्ड ने कुछ वर्ष पहले ऐसा ही प्रतिबंध लगाया था लेकिन छत्तीसगढ़ और कई अन्य राज्यों ने इसे मानने से इनकार कर दिया था. शिक्षाविद् भी इस प्रतिबंध से सहमत नहीं हैं. अध्यापिका राजश्री शास्त्री का कहना है कि जीवों की चीरफाड़ का उद्देश्य यही है कि मेडिकल की पढ़ाई करने पर छात्र को आंतरिक अंगों की जानकारी रहे. उनका कहना है कि बोर्ड को ऐसी प्रजातियों के जीवों की चीरफाड़ पर प्रतिबंध लगाना चाहिए जिन पर ख़तरा हो. लेकिन मेढ़क और झींगा मछली बहुतायत में पाए जाते हैं और उनकी संख्या बढ़ाई जा सकती है. |
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