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बुधवार, 21 सितंबर, 2005 को 22:53 GMT तक के समाचार
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मौत की करवट बैठ रहे हैं ऊँट

राजस्थान के ऊँटों को पर्याप्त चारा नहीं मिल रहा
रेगिस्तान में रहने वाले अरब ऊँट को अताउल्लाह कहते हैं जिसका अर्थ होता है खुदा का तोहफा.

लेकिन स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेस के अनुसार राजस्थान रेगिस्तान का जहाज़ कहे जाने वाले ऊँटों को खोता जा रहा है.

अकेले राजस्थान में ही देश के 80 प्रतिशत से अधिक ऊँट रहते हैं.

जोधपुर स्थित स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेस रेगिस्तान से जुड़े तमाम मुद्दों का अध्ययन करता है, उनके एक शोध के अनुसार राजस्थान में पिछले बीस वर्षों में ऊँटों की तादाद में पचास फीसदी तक की कमी आई है.

स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेस के प्रमुख प्रोफेसर सुरेंद्र मल मोहनोत कहते हैं कि ऊँटों की संख्या में यह गिरावट पिछले पाँच-सात साल में और तेज़ हुई है.

प्रोफेसर मोहनोत के अनुसार ऊँटों की संख्या में गिरावट का मुख्य कारण चारे की कमी है.

प्रोफ़ेसर मोहनोत बताते हैं कि "ऊँट तीन स्थानों से भोजन ग्रहण कर सकता है ज़मीन से, झाड़ियों से और ऊँचे पेड़ों से. हाल के वर्षों में इन तीनों की उपलब्धता में कमी आई है."

अभयारण्य

अभयारण्य तो बनाए जाते हैं जंगली जानवरों को सुरक्षित रखने के लिए, लेकिन राजस्थान में ऊँटों के लिए वे मुसीबत का कारण बन गए हैं.

 अभयारण्यों में प्रवेश बंद हो जाने के बाद काफी संख्या में पशुपालकों ने छोटे पशुओं जैसे भेड़-बकरी की ओर अपना ध्यान मोड़ा है
कुलदीप शर्मा

स्कूल ऑफ़ डेजर्ट साइंसेज़ के अध्ययन के अनुसार चूंकि अभयारण्यों में ऊँटों का प्रवेश वर्जित है जो इनके लिए भोजन का मुख्य स्रोत हुआ करता था इसलिए वे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं.

इस अध्ययन के साथ शुरू से जुड़े रहे कुलदीप शर्मा कहते हैं, "अभयारण्यों में प्रवेश बंद हो जाने के बाद काफी संख्या में पशुपालकों ने छोटे पशुओं जैसे भेड़-बकरी की ओर अपना ध्यान मोड़ा है."

वे कहते हैं कि हाथियों के शिकार पर रोक का भी ऊँटों की संख्या पर असर पड़ा है क्योंकि ऊँट की हड्डी अब बड़ी तादाद में हाथी दाँत की जगह इस्तेमाल में लाई जाने लगी है.

ऊँट जंगली पशु की श्रेणी में नहीं आता इसलिए उसे मारने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, कई इलाक़ों में तो लोग ऊँटों को माँस के लिए मार देते हैं.

राजस्थान में कई प्रजाति के ऊँट पाए जाते हैं जिनमें बीकानेरी, जैसलमेरी, सीकरी प्रमुख हैं.

जैसलमेर के ऊँट पालक नाथामल सिंह कहते हैं, "पिछले कई सालों से पड़ रहे अकाल ने हालात और खराब कर दिए हैं, अब ऊँट पालना बहुत कठिन काम है."

राजस्थान में ऐसे बहुत सारे गाँव हैं जहां आज भी ऊँट ही यातायात का इकलौता विश्वसनीय साधन है. राजस्थान के अधिकतर किसान आज भी खेती में हल जोतने के लिए ऊँट का इस्तेमाल करते हैं.

स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेस के प्रोफेसर मोहनोत कहते हैं कि गैर पारम्परिक ऊर्जा के इस दौर में हमें ऊँट की ऊर्जा का अधिक से अधिक उपयोग करने की योजना बनानी चाहिए वहीं उल्टे हम उन्हें खोते जा रहे हैं.

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