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सोमवार, 31 जुलाई, 2006 को 10:23 GMT तक के समाचार
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एनएससीएन के साथ संघर्ष विराम बढ़ा

एनएससीएन के साथ बैंकॉक में वार्ता चल रही है
एनएससीन का दफ़्तर
अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नगालैंड यानी एनएससीएन और भारत सरकार के बीच घोषित संघर्ष विराम की अवधि आगे बढ़ा दी गई है.

एनएससीएन और केंद्र सरकार के बीच अभी शांति वार्ता चल रही है. एनएससीएन ने कहा है कि संघर्ष विराम तब तक जारी रहेगा जब तक शांति वार्ता जारी रहती है.

दोनों पक्षों के बीच तय सहमति के आधार पर घोषित संघर्ष विराम की अवधि 31 जुलाई को ख़त्म हो रही थी.

एनएससीएन के प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि पहले हर छह महीने पर संघर्ष विराम की अवधि को आगे बढ़ाना पड़ता था लेकिन अब ऐसा नहीं करना पड़ेगा.

 अब संघर्ष विराम की कोई निश्चित अवधि नहीं होगी. जब तक बातचती जारी रहेगी तब तक ये लागू रहेगा
गृह मंत्रालय प्रवक्ता

अलगाववाद से जूझ रहे पूर्वोत्तर राज्यों में एनएससीएन की गिनती ताक़तवर संगठन के रूप में होती है. इसके पास लगभग छह हज़ार हथियारबंद सदस्यों की फ़ौज है.

वार्ता

केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, "अब संघर्ष विराम की कोई निश्चित अवधि नहीं होगी. जब तक बातचती जारी रहेगी तब तक ये लागू रहेगा."

एनएससीएन प्रवक्ता ने बताया कि संघर्ष विराम अनिश्चित समय के लिए बढ़ाने का फ़ैसला इसी सप्ताहांत बैंकॉक में भारत सरकार के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक में लिया गया.

एनएससीएन के नेता सू आईज़ैक और टी मुईवा वर्ष 2003 में दिल्ली आकर केंद्र सरकार के साथ बात कर चुके हैं

दोनों पक्षों के बीच संघर्ष विराम को इस तरह बढ़ाने का फ़ॉर्मूला दलाई लामा के विधि सलाहकार माइकल वॉन वाल्ट ने दिया था. वे केंद्र और एनएससीएन के बीच बातचीत में सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं.

ताज़ा दौर की बातचीत में दोनों पक्षों में नगा समस्या के समाधान के लिए 'विस्तृत राजनैतिक रुपरेखा' पर सहमति बनी.

केंद्र सरकार ने नगालैंड को कश्मीर जैसा संवैधानिक दर्जा देने का प्रस्ताव दिया है लेकिन एनएससीएन चाहती है कि कोई भी समझौता भारतीय संविधान के दायरे से अलग हो.

हलाँकि एनएससीएन के महासचिव टी मुईवा ने रुख में नरमी का संकेत देते हुए कहा, "सबसे पहले तो हमें नगालैंड और भारत के बीच संवैधानिक रिश्ता क्या होगा इस पर सहमित बनाना है. भारतीय संविधान के तहत ही आपस में कोई समझौता करना मुश्किल नहीं होगा क्योंकि हम इसे अपने नगा संविधान में शामिल कर सकते हैं."

भारत सरकार और नगा विद्रोहियों के बीच पिछले सात वर्षों से बातचीत चल रही है जिसका कोई नतीजा नहीं निकल सका है. पाँच दशक पुरानी नगा समस्या भारत की सबसे पुरानी चरमपंथी समस्या है.

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