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सोमवार, 24 जुलाई, 2006 को 14:33 GMT तक के समाचार
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अहम भूमिका निभाए भारत: राजपक्षे

राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे
राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे भारत की भूमिका को अहम मानते हैं.
श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे चाहते हैं कि दो दशक से देश में चल रहे जातीय संघर्ष के समाधान खोजने के लिए भारत अहम भूमिका निभाए.

ग़ौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों में श्रीलंका सरकार, तमिल विद्रोहियों के संगठन एलटीटीई के बीच युद्ध विराम समझौते के बावजूद हिंसा बढ़ी है.

पिछले वर्ष नवंबर में राष्ट्रपति पद पर चुने कर आए महिंदा राजपक्षे को आशा है कि वे अपने कार्यकाल में इस समस्या का हल निकाल पाएँगे.

उन्होंने इस बारे में बीबीसी से बात करते हुए कहा, "मैं एलटीटीई से बात करने और उनका पक्ष सुनने के लिए तैयार हूँ. आख़िर प्रभाकरन भी श्रीलंका का नागरिक है. मैं उससे मिलने को तैयार हूँ और उससे बात करने को भी, पर वो तैयार नहीं हैं."

राष्ट्रपति ने आशा व्यक्त की कि एक पड़ोसी देश के नाते भारत प्रभाकरन पर अपने प्रभाव का प्रयोग कर उसे बातचीत के लिए मनाने पर ज़ोर दे पाएगा. उन्होंने कहा, "भारत को हरसंभव सहायता करनी चाहिए."

नज़रिए पर चिंता

राजपक्षे दुनिया के नज़रिए से भी क्षुब्ध नज़र आए. उनका कहना था कि इसराइल और लेबनान के बीच युद्ध जैसी स्थिति है पर इसराइल के क़दम की कोई आलोचना नहीं कर रहा.

विश्व समुदाय मूक दर्शक बना हुआ है. अगर श्रीलंका में युद्ध होता तो दुनिया के कई लोग आकर कहते कि यह आदमी पागल हो गया है.

 मैं युद्ध नहीं चाहता. देश की समस्या का समाधान एक ऐसे समीकरण से ही हो पाएगा जो सभी सिंहला, तमिल और मुसलमानों को मान्य हो. जिसे उत्तर और दक्षिण के लोग माने. मेरी ओर से विशेषज्ञों की समिति कुछ ऐसे प्रस्ताव लाएगी जिसे प्रभाकरण के पास ले जाया जा सके और जिसपर वो अपना मत भी व्यक्त करे
राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे

राजपक्षे का मानना है कि श्रीलंका की जातीय समस्या को बातचीत से ही हल किया जा सकता है. इसके लिए विशेषज्ञों और राजनीतिज्ञों की एक समिति बनाई गई है जो कि सत्ता के विकेंद्रीकरण के कई विकल्पों की चर्चा कर रही है.

इसमें भारत के संघीय ढाँचे समेत कई मॉडलों पर विचार हो रहा है पर साथ ही राष्ट्रपति यह भी मानते हैं कि श्रीलंका के लिए ख़ुद उसका मॉडल ही कारगर रहेगा.

उन्होंने स्पष्ट किया, "मैं युद्ध नहीं चाहता. देश की समस्या का समाधान एक ऐसे समीकरण से ही हो पाएगा जो सभी सिंहला, तमिल और मुसलमानों को मान्य हो. जिसे उत्तर और दक्षिण के लोग माने. मेरी ओर से विशेषज्ञों की समिति कुछ ऐसे प्रस्ताव लाएगी जिसे प्रभाकरन के पास ले जाया जा सके और जिसपर वो अपना मत भी व्यक्त करे."

महिंदा राजपक्षे को भारी संख्या में सिंहला लोगों का समर्थन प्राप्त है और अपने चुनाव प्रचार में वो नॉर्वे की मध्यस्थता से नाराज़गी भी व्यक्त कर चुके हैं.

भारत का दखल

श्रीलंका की ओर से हाल में लगातार भारत की अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने संबंधी बयान आते रहे हैं.

एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरन
माना जा रहा है कि भारत चाहे तो प्रभाकरन स्थायी समाधान के लिए तैयार हो सकते हैं

पर विश्लेषक कहते हैं कि वर्ष 1987 में भारतीय शांति सेना के अनुभव और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या के बाद भारत श्रीलंका के आंतरिक मामलों में दखल देने से परहेज़ करता रहा है और आगे भी ऐसा ही करेगा.

साथ ही केंद्र में काँग्रेस सरकार और तमिलनाडु में डीएमके सरकार के रहते किसी हस्तक्षेप की संभावना और भी क्षीण हो जाती है.

हालांकि श्रीलंका के अधिकारियों का मानना है कि भारत का प्रभाकरन पर इतना प्रभाव तो है ही कि उन्हें बातचीत के लिए भारत राज़ी कर सकता है.

राष्ट्रपति राजपक्षे का इस बारे में मानना है कि यह काम आसान नहीं होगा.

उन्होंने कहा, "आप ऐसे आदमी की बात कर रहे हैं जो लोकतंत्र को नहीं जानता, जो जंगल में अकेले रहता है, अपने लोगों से घिरा हुआ. जो दुनिया से पूरी तरह कटा हुआ है. जिससे कोई नहीं मिल सकता. ऐसे आदमी से बातचीत करना आसान नहीं."

'तमिल राष्ट्र'

उल्लेखनीय है कि प्रभाकरन और उनका संगठन एक पृथक तमिल राष्ट्र की माँग करते रहे हैं और स्वयं को तमिलों की आवाज़ बताते हैं.

 आजकल एलटीटीई लोगों को दक्षिण भारत भेज रहा है. हमारे यहाँ शरणार्थी शिविर हैं पर एलटीटीई के डर से लोग दक्षिण भारत जा रहे हैं. उन्हें पता है कि अगर वे एलटीटीई की बात नहीं मानेंगे तो रात के अंधेरे में वे मारे जाएंगे
राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे

हालांकि उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका में हिंसा के कारण कई तमिल शरणार्थियों का जीवन व्यतीत कर रहे हैं.

उधर राजपक्षे का आरोप था कि भारत में बड़ी संख्या में तमिल शरणार्थी स्वयं नहीं आ रहे बल्कि उन्हें प्रभाकरन संकट बढ़ाने के लिए भेज रहा है.

उन्होंने कहा, "आजकल एलटीटीई लोगों को दक्षिण भारत भेज रहा है. हमारे यहाँ शरणार्थी शिविर हैं पर एलटीटीई के डर से लोग दक्षिण भारत जा रहे हैं. उन्हें पता है कि अगर वे एलटीटीई की बात नहीं मानेंगे तो रात के अंधेरे में वे मारे जाएंगे."

विश्लेषकों का मानना है कि क्योंकि राजपक्षे को दक्षिण पंथी सिंहला विचारधारा का समर्थन प्राप्त है इसलिए किसी भी समझौते को इनसे मनवाना उनके लिए आसान होगा.

वहीं एक तर्क ये भी है कि चूँकि राजनेता जानते हैं कि बिना तमिल इच्छाओं की पूर्ति के चुनाव जीते जा सकते हैं इसलिए वो तमिल इच्छाओं की पूर्ति को अपनी प्राथमिकता नहीं मानते.

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