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कमज़ोर हो रही है प्रधानमंत्री की छवि | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रधानमंत्री के रूप में मई 2004 में कार्यभार संभालने वाले मनमोहन सिंह ने अभी आधा रास्ता भी तय नहीं किया है लेकिन पिछले कुछ हफ़्तों में एक के बाद एक ऐसी कई घटनाएँ हुईं जो उन्हें लाचार और बेबस प्रधानमंत्री साबित करती हैं. ख़ासकर एम्स के निदेशक वेणुगोपाल की बर्ख़ास्तगी के मुद्दे पर सरकार का मूक दर्शक बना रहना और विनिवेश पर जिस तरह सरकार ने अपने पैर वापस खींचे, उसके बाद से मनमोहन सिंह की छवि एक कमज़ोर प्रधानमंत्री की बनती जा रही है. मनमोहन सिंह के राजनीतिक क़द के संदर्भ में तो किसी को कभी भी ग़लतफ़हमी नहीं थी. वो सोनिया गांधी के आशीर्वाद से प्रधानमंत्री बने और तब तक बने रहेंगे जब तक कि 10 जनपथ की नज़रें टेढ़ी नहीं होतीं. कई प्रेक्षकों का तो शुरुआत से ही यह मानना रहा है कि उनका राजनीतिक बौनापन ही उनकी प्रधानमंत्री पद की सबसे बड़ी योग्यता थी. हालांकि मैं इस सोच से सहमत नहीं हूँ. सोनिया गांधी के कई अन्य वफ़ादार सिपहसालारों ने भले ही यह बात बार-बार दोहराई हो कि मनमोहन सिंह का कोई जनाधार नहीं है और वो कभी भी गांधी परिवार को कोई चुनौती नहीं दे पाएँगे पर शायद सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री उनकी सकारात्मक योग्यताओं के आधार पर ही चुना है. बेहतर विकल्प मनमोहन सिंह एक लंबे अनुभव वाले कुशल प्रशासक और अंतरराष्ट्रीय ख़्याति प्राप्त अर्थशास्त्री हैं और उनसे ज़्यादा स्वच्छ छवि वाला ईमानदार नेता कांग्रेस के पास और कोई नहीं है. मनमोहन सिंह के चयन पर कांग्रेस विरोधियों तक का मुँह बंद हो गया था और अपनी छवि, ईमानदार आचरण और कभी किसी व्यक्तिगत विवाद या टकराव में नहीं उलझने के कारण मनमोहन सरकार का जनता के साथ हनीमून भी अन्य सरकारों के मुक़ाबले लंबा चला. राजनीतिक प्रेक्षक भी उनका आकलन करने में काफ़ी उदारता दिखाते रहे. कांग्रेस चुनाव हारती तो ज़िम्मेदारी पार्टी और सोनिया गांधी की मानी जाती. मंत्रिमंडल में काम के बँटवारे की ज़िम्मेदारी भी कांग्रेस अध्यक्षा और सहयोगी दलों के नेताओं की ही मानी जाती रही. महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियाँ भी 10 जनपथ या फिर गठबंधन में शामिल बड़े दलों के नेताओं के इशारे पर होती रहीं और आर्थिक सुधार कार्यक्रमों की ढुलमुल गति का सेहरा वामपंथी दलों की धमकियों के सिर बांधा जाता रहा. बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने का फ़ैसला लिया गया तो प्रधानमंत्री के क़रीबी अधिकारी यह कहते नज़र आए कि प्रधानमंत्री तो इस फ़ैसले से नाख़ुश हैं पर क्या करें, उनकी इस तरह के मामलों में चलती कहाँ है. बदलती छवि इशारा हमेशा यह होता था कि मनमोहन सिंह केवल प्रशासनिक और विदेश मामलों के प्रधानमंत्री हैं, राजनीतिक मामलों के नहीं. अब धीरे-धीरे इस तरह के स्पष्टीकरणों से प्रेक्षकों का मोह भंग होने लगा है और पिछले दो दिनों में ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री की बेबसी जैसे सार्वजनिक हो गई है. दिल्ली में सभी लोग जानते हैं कि प्रधानमंत्री एम्स के निदेशक डॉक्टर वेणुगोपाल के हटाए जाने के पक्ष में नहीं थे पर स्वास्थ्य मंत्री रामदॉस के सामने उनकी एक नहीं चली. इसके अलावा एनएलसी यानी नाइवेली लिग्नाइट और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के विनिवेश पर उन्होंने जिस तरह से रोक लगाई है उससे तो यह साफ़ हो गया है कि गठबंधन सरकार में शामिल घटक दलों की धमकियों के सामने खड़े होने का साहस उनकी सरकार में नहीं है. इस आकलन का यह अर्थ कतई नहीं निकालना चाहिए कि मनमोहन सिंह की सरकार या उनके पद को किसी किस्म का ख़तरा है. यह दौर गठबंधन राजनीति का है और उनकी सरकार पाँच वर्ष भी चल सकती है लेकिन इस सरकार और मनमोहन सिंह का जादू 25 महीनों में ही जैसे ख़त्म हो गया है. | इससे जुड़ी ख़बरें मनमोहन ने विनिवेश की प्रक्रिया रोकी06 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस एम्स के निदेशक बर्ख़ास्त, हड़ताल घोषित05 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस विदर्भ के लिए अरबों रूपए का पैकेज01 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस आरक्षण का मुद्दा ख़त्म- मनमोहन25 मई, 2006 | भारत और पड़ोस 'सामरिक कार्यक्रम पर कोई अंकुश नहीं'07 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस 'ईरान पर मसौदा देखकर रुख़ तय करेंगे'01 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस प्रधानमंत्री की अल्फ़ा से बातचीत26 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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