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मौत की मन्नत माँगने को मजबूर.... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के राजस्थान राज्य में जात-बिरादरी का बंधन तोड़कर प्रेम विवाह करने वाले एक युगल ने मौत की मन्नत माँगी है. जाति समाज के सतत विरोध से परेशान भरतपुर के गोपाल शर्मा और उसकी पत्नी सत्यवती ने राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु की अनुमति देने का आग्रह किया है. अफ़सोस तो यह है कि समाज की प्रताड़ना से आहत इस जोड़े की मदद को कोई भी तैयार नहीं है. गोपाल का गुनाह यह है कि वो जाति से ब्राह्मण है तो सत्यवती जाट बिरादरी से है. सत्यवती कहती है कि साढे़ तीन साल पहले जब वो गोपाल से प्रेम के बाद विवाह सूत्र में बँधी तो उसके दिल में भविष्य के अरमानों की आँधी उमड़ पड़ी. मुश्किलें लेकिन शादी की शहनाइयों की गूँज अभी ख़त्म भी नहीं हुई थी कि उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. समाज और स्थानीय पुलिस ने उसका जीना दुश्वार कर दिया. सत्यवती रुंधी हुई आवाज़ में कहती हैं, ‘‘मुझे ढाई माह का गर्भ था, पर बिरादरी के लोगों ने उस पर रहम नहीं किया. मेरे मायके से एक सदस्य ने पेट पर लात मार कर गर्भ गिरा दिया. ’’ सत्यवती ने पुलिस में मामला दर्ज कराया तो पुलिस ने ऐसी किसी घटना होने से इंकार कर मामला ही रफ़ा दफ़ा कर दिया. सत्यवती ने वो भ्रूण रसायन का लेप लगा कर घर पर ही सुरक्षित रखा है. सत्यवती कहती है ‘‘यह भ्रूण हमारी मोहब्बत की निशानी है. लेकिन उससे भी कहीं ज़्यादा यह समाज और पुलिस की बेदर्दी पर एक तल्ख़ बयान भी.’’ बहिष्कार गोपाल के घर वालों को इस शादी पर कोई आपत्ति नहीं है. उन्होंने सत्यवती को घर की बहू के रूप में स्वीकार कर लिया. गोपाल के बड़े भाई सुरेश ने भी अंतरजातीय विवाह किया है. गोपाल कहते हैं ‘‘मोहल्ले में हमारा बहिष्कार कर दिया गया है. कहा जा रहा है कि ऐसी शादियों से बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. जब संविधान और हमारे नेता जात पात मिटाने का आह्वान करते हैं तो हमारे विवाह में जात दीवार बनकर क्यों खड़ी हो जाती है. ’’ गोपाल और सत्यवती पुलिस के निशाने पर है. पुलिस उसे दो मुक़दमों में गिरफ़्तार कर चुकी है. 'प्रताड़ना' सत्यवती कहती हैं कि गाहे बगाहे पुलिस उनके घर आ धमकती है और कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते-काटते वे लोग परेशान हो गए हैं. लेकिन भरतपुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक हैदर अली जै़दी ने बीबीसी से कहा, "मुझे इस घटना की जानकारी नहीं है, हम इस दंपत्ति की शिकायत पर गौर करेंगे.’’ सत्यवती कहती हैं कि हद तो तब हो गई जब एक स्थानीय नेता सरकारी मशीनरी के साथ हमारा मकान धवस्त करने आ धमका. जो घर जातिवाद की बुराई के विरुद्ध मिसाल और मीनार की तरह काम आ सकता था अब गोपाल और सत्यवती का वो घरौंदा जात-परस्त तत्वों को काँटे की तरह खटक रहा है. सत्वती कहती हैं, “पिछले साढ़े तीन साल में मेरे पति सिर्फ़ 275 दिन काम कर सके हैं. उनका पूरा समय हमारी सुरक्षा के उपाय करने में गुज़रता है. इन मुसीबतों के बावजूद वे अपनी आठ माह की बेटी को देखकर ही खुश हैं.” संविधान, सियासत और सरकार- जातिवाद पर किसी भी आदर्श की बात करें लेकिन सत्यवती के दर्द की दास्तान कहती है कि वो इस सामाजिक बुराई के ख़िलाफ़ लड़ाई में अकेली है- निहायत एकाकी और निस्सहाय भी. |
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