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संविधान सभा के गठन का फ़ैसला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में संसद ने संविधान सभा के गठन का ऐतिहासिक फ़ैसला किया है. सभा नया संविधान लिखेगी और वह राजशाही के भविष्य के विषय में भी निर्णय करेगी. यह माओवादियों की पुरानी माँग थी और वे पिछले दस साल से राजशाही के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़े हुए हैं. मौजूदा संविधान में राजशाही की भमिका में कोई बदलाव की व्यवस्था नहीं है. संसद ने सर्वसम्मति से इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया. प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला ने इस आशय का प्र्स्ताव संसद में पेश किया. संसद की बैठक चार साल बाद हो रही है. संसद ने यह निर्णय प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला को राजा ज्ञानेंद्र के शपथ दिलाने के बाद लिया. संसद के 205 सदस्यों ने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को पारित कर दिया. हालांकि संविधान सभा कब गठित की जाएगी और उसकी प्रक्रिया क्या होगी, इस पर निर्णय नहीं हो पाया है. माओवादी राजशाही की समाप्ति चाहते हैं लेकिन अन्य विपक्षी दलों ने 250 साल पुराने इस संस्था की पूरी तरह समाप्ति पर अभी तक अपना रुख़ स्पष्ट नहीं किया है. इसके पहले नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने पुनर्गठित संसद को अपने पहले संबोधन में माओवादियों से हिंसा का त्याग करके बातचीत के लिए आगे आने का आह्वान किया. अपने भाषण में कोइराला ने सबसे पहले नेपाल की जनता का अभिनंदन करते हुए कहा कि यह संसद उनके ऐतिहासिक जनांदोलन के कारण ही फिर से अस्तित्व में आई है. उन्होंने संसद के पुनर्गठन को एक नया कीर्तिमान और महान उपलब्धि बताया है. उन्होंने कहा कि सात राजनीतित दलों और माओवादियों के बीच जो 12 सूत्री समझौता हुआ है उसे पूरा करना उनका दायित्व है. उन्होंने शांति स्थापित करने और प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को पुनर्व्यवस्थित करने और आर्थिक पुनर्रचना के लिए समस्त वर्गों को एकजुट रखने का आह्वान किया. |
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