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रविवार, 16 अप्रैल, 2006 को 05:15 GMT तक के समाचार
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जागरुक हो रहा है मध्य वर्ग?

मज़दूर
मध्य वर्ग को अपनी फ़िक्र है, गरीबों की फ़िक्र किसे है
दिल्ली के जंतर मंतर पर अपनी आवाज़ बुलंद करते भोपाल गैस कांड के पीड़ित हों या फिर नर्मदा बचाओ आंदोलन के धरना देते लोग. इनके समर्थन में कई लोग आगे आए हैं और सरकार ने एक हद तक उनकी बात भी सुनी है.

मीडिया कवरेज़ के बाद मध्यवर्ग की बढ़ती मांग के कारण मॉडल जेसिका लाल की हत्या की फिर से जाँच के आदेश हों या फिर दिल्ली के गली कूचों में मकान मालिक और दुकानदारों की बुलंद आवाज़, मन में एक सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई मध्य वर्ग अपने घरों से निकल अपनी आवाज़ बुलंद करने सड़कों पर आ रहा है ?

समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता कहते हैं आज भी जितना उन्हें निकलना चाहिए –जैसे स्वतंत्रता संग्राम या 60-70 के दशक में वैसा नहीं हो रहा है.

वो कहते हैं ‘‘ आज जो यह देख रहे हैं यह बहुत कम है. मध्यवर्ग को और ज़्यादा तादाद में सड़कों पर उतरना चाहिए. हमारे देश में जो हो रहा है क़ानून के ख़िलाफ जो लोग काम करते रहते हैं कई चीज़ों में एक्टिव हो जाते हैं जब कोई लीड लेता है. ये मध्यवर्ग अनुसरण करने वाला है. मेधा पाटकर ने लीड लिया और फिर वे भूख हड़ताल पर गईं फिर इनका गिल्ट कॉनसस लगा तो ये बाहर आए. ’’

पवन वर्मा जिन्होंने मध्यवर्ग पर एक किताब लिखी है द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास. कहते है कि भारत में मध्यवर्ग तभी हिलता है जब चोट उसे पहुँचती है.

पवन कहते हैं ‘‘जब कोई घटना या मुद्दा उनकी दुनिया से जुड़ा हुआ उठता है तो उसकी प्रतिक्रिया होती है. वे उद्वेलित होते है. हाल ही में दिल्ली में करीब हज़ार झुग्गियाँ जल गईं. ऐसे घटनाओं पर मध्यवर्ग को अफसोस ज़रूर होता होगा पर उसे उसी तरह से अपनी प्रतिक्रिया में रेखांकित नहीं करते. ’’

पिछले दिनों फ्रांस में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बारे में आपने सुना होगा. वहाँ जनता का विरोध इस कदर बढ़ा कि सरकार को विवादास्पद नागरिक क़ानून को बदलने पर मजबूर होना पड़ा.

आमिर खान
आमिर खान ने भोपाल गैस पीड़ितों और नर्मदा आंदोलन को समर्थन दिया है

हाल में फ्राँस से लौटे अखिल भारतीय खेत मज़दूर संघ के सह सचिव और वापमंथी विचारधारा रखने वाले सुहीत चौपड़ा का तर्क है कि गलियारों से उठी आवाज़ सत्ता के गलियारों तक पहुंची है. 33 लाख से ज़्यादा आदमी हड़ताल के लिए सामने आए और अंत में फ्रांस के राष्ट्रपति ने कहा कि हम यह क़ानून बदलेंगे.

हाल में मध्यवर्ग में बेहद लोकप्रिय रही और उसे एक तरह से प्रतिबंबित करती हुई फ़िल्म बड़े पर्दे पर दिखी थी. रंग दे बसंती, फ़िल्म के युवा नायक तब जागते हैं जब उनका एक मित्र मिग विमान दुर्घटना में मारा जाता है

और हाल में रुपहले पर्दे से दूर मॉडल जेसिका लाल के हत्यारों के बच निकलना लोगों को इतना उद्धेलित किया कि वे इंडिया गेट पहुँच गए और मोमबती जलाकर विरोध करने, कुछ कुछ रंग दे बसंती की ही तरह.

तो सवाल ये उठता है कि क्या किसी मशहूर हस्ती का विरोधों से जुड़ना जैसे अरूंधती रॉय और मेधा पाटकर मध्यवर्ग को अपने घरों से बाहर खींचता है ?

पवन वर्मा कहते हैं‘‘ हिंदुस्तान में चाहे वह मध्यवर्ग हो या उससे नीचे के वर्ग हो या फिर ऊँचा वर्ग नामचीन लोगों की तरफ झुकाव एक अहम चीज़ है. जब मध्यवर्ग में दहशत होती है जैसे डकैती या खूनखराब जो उसकी दुनिया से जुड़े हों तो उसकी कड़ी प्रतिक्रिया होती है. एक चीज़ अच्छी ज़रूर है कि चाहे उसी की दुनिया के सीमित चीज़ों से उसमें इस तरह की प्रतिक्रिया तो कर रहा है. ये मानना कि मध्यवर्ग अब एक संवेदनशील वर्ग बन चुका है और वह हर मुद्दे जिसमें कि अन्याय हो रहा जुड़ गया है यह गलत भी है ’’

20 करोड़ से बड़ा ये मध्यवर्ग भारत में इतनी बड़ी शक्ति बन के कभी नहीं उभरा. न एक आवाज़ में बोला क्योंकि ये एक चरित्र नहीं रखते, एक ही तरह की सोच नहीं रखते. दीपांकर गुप्ता कहते हैं ‘‘ एक मध्यवर्ग जैसी चीज़ यहाँ नहीं है. हम अलग अलग वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं. एक मध्यवर्ग समाज तभी होगा जब 70 से 80 प्रतिशत बहुमत हो. हमारे मध्यवर्ग 5 से 10 प्रतिशत ही हैं और उसमें से सब अपने आप को बुद्धिजीवी समझते हैं. ’’

मध्यवर्ग में अब विचारधारा के प्रति लगाव नहीं है पर वैश्वीकरण के युग में उसे पता है कि अगर वे आवाज़ नहीं उठाएगी तो उसकी सुनवाई नहीं होगी. मध्यवर्ग ने धरना प्रदर्शन हड़ताल देखा है. वादों का टूटना दगा है और वह अपनी बात अपने हिसाब से उठाना चाहता है.

पवन वर्मा का कहना है‘‘ मध्यवर्ग में ख़ासतौर से वर्किंग क्लास ज़्यादा संगठित है. उनके यूनियन है प्रवक्ता है पॉलिसी है और मुद्दे के लिए मध्यवर्ग की सोच थी कि वह बिखरा हुआ है. पर कुछ मुद्दों पर मध्यवर्ग अपने आपको एक सक्रिय रूप में अपनी आवाज़ उठाने के क़ाबिल हुआ है ’’

अब मोबाइल फोन पर संदेश हो, इंटरनेट के ज़रिए संदेशों की आवाजाही से देश विदेश तक संपर्क साध लेते हैं. जब सत्येंद्र दुबे या मंजूनाथ जैसे लोग भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं और मारे जाते हैं तो दुनिया भर से आवाज़ उठती है.

संचार के सभी माध्यमों का इस्तेमाल होता है और अगर ज़रूरत पड़े तो शुरूआती मदद के लिए किसी मशहूर हस्ती का इस्तेमाल भी किया जा सकता है.

सुमीत चोपड़ा कहते हैं ‘‘सफलता अंत में उन नामचीन हस्तियों की नहीं होती. राष्ट्रीय रोज़गार क़ानून आए और मशहूर हस्तियों ने धरना प्रदर्शन भी दिया. लेकिन पास इसलिए हुआ कि गाँव का एक गरीब नौजवान बिल्कुल तैयार नहीं था कि बेरोज़गार करके कहीं भेज दीजिए. इसलिए उन नौजवानों ने यह तय कर लिया कि जो हमारा कान नहीं करेगा उसे भगाएंगे. ’’

यानि मध्यवर्ग को वोट की ताकत के बाद अपनी बुलंद आवाज़ और आर्थिक शक्ति की ताक़त का भी अंदाज़ा हो रहा है और आने वाले दिनों में उसकी आवाज़ और सशक्त होगी.

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