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आमने-सामने हैं हीरो और विलेन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उन दोनों में लड़ाइयाँ तो पहले भी कई बार हो चुकी है और उनमें हर बार हीरो ही जीतता रहा है. लेकिन इस बार दोनों की लड़ाई अलग है. इसमें कौन जीतेगा, यह तय नहीं है. बांग्ला फ़िल्मों के मशहूर हीरो तापस पाल और बैडमैन यानी विलेन विप्लव चटर्जी अबकी फ़िल्मी पर्दे पर नहीं बल्कि चुनाव के मैदान में आमने-सामने हैं. पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों में राजधानी कोलकाता के पॉश इलाक़े की अलीपुर सीट पर तृणमूल की ओर से तापस पाल दूसरी बार अपनी क़िस्मत आज़मा रहे हैं तो माकपा ने यहाँ विप्लव चटर्जी को मैदान में उतारा है. इस सीट के लिए 27 अप्रैल को वोट पड़ेंगे. इन दोनों सितारों के मैदान में उतरने से यहाँ मुक़ाबला काफ़ी दिलचस्प हो गया है. पाल ने पिछले विधानसभा चुनावों में यह सीट जीती थी. चटर्जी ने भी 1998 में लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे. ‘दादार कीर्ति’ से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत करने वाले तापस पाल ने माधुरी दीक्षित की पहली फ़िल्म ‘अबोध’ में उनके हीरो की भूमिका निभाई थी. लोकप्रियता अस्सी और नब्बे के दशक में सैकड़ों फ़िल्मों में अभिनय कर फ़िल्मफेयर समेत कई अवार्ड और दर्शकों की सराहना बटोर चुके पाल को अब भी बंगाल में युवा दिलों की धड़कन माना जाता है. दूसरी ओर, वर्ष 1970 में सत्यजित राय की फ़िल्म ‘प्रतिद्वंद्वी’ से अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत करने वाले विप्लव को फ़िलहाल बांग्ला फ़िल्मों का सबसे बड़ा विलेन माना जाता है. बंगाल के फ़िल्म उद्योग में उनको विलेनों का राजा कहा जाता है. दोनों फ़िल्मी हस्तियाँ घर-घर घूम कर अपना प्रचार करने में जुटी हैं. पाल जहाँ भी जाते हैं, प्रशंसकों की भीड़ आटोग्राफ़ के लिए उनको घेर लेती है. वे कहते हैं कि ‘आटोग्रॉफ़ तो दे रहा हूँ. लेकिन अपना वोट मुझे ही दीजिएगा.’ चिलचिलाती धूप में पसीने से तर-बतर होकर सुस्ताते समय कई बार लोग साथ फोटो खिंचवाने का भी अनुरोध कर बैठते हैं. पाल उनको टाल नहीं पाते. ऐसे ही प्रचार के दौरान एक मकान में पहुँच कर वे एक बूढ़ी महिला से बांग्ला में कहते हैं कि ‘मां, एबारो आमाके वोट देबे तो (मां, इस बार भी हमको वोट दोगी न?).’ उसके बाद वे सुस्ताने के लिए कुछ देर वहाँ बैठकर बातें करने लगते हैं. वे कहते हैं कि ‘मेरे जीवन में फ़िल्में और राजनीति दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं, लेकिन दोनों एक जैसे महत्वपूर्ण हैं.’ उधर, लकदक सफेद कुर्ते-पाजामे में घर-घर घूम रहे विप्लव चटर्जी कहते हैं कि ‘जीतने के बाद वे फ़िल्मी पर्दे के उलट राजनीति के पर्दे पर सकारात्मक भूमिका निभाएँगे और उन सभी वादों को पूरा करेंगे जो पार्टी ने किए हैं.’ छवि लेकिन वे एक साथ दो-दो छवियों से लड़ रहे हैं. अपने प्रतिद्वंद्वी पाल की राजनीतिक रूप से साफ़-सुथरी छवि और अपनी नकारात्मक छवि.
बांग्ला फ़िल्मों के अलावा वे कई टीवी सीरियलों में भी काम कर चुके हैं. सत्यजित राय की फ़िल्म से करियर शुरू करने वाले विप्लव को उनकी ही फ़िल्म ‘जय बाबा फेलूनाथ’ ने रातों-रात प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचा दिया था. वे कहते हैं कि ‘मेरी लड़ाई तृणमूल कांग्रेस जैसी एक दिशाहीन व सिद्धांतविहीन राजनीतिक पार्टी है जो बंगाल के विकास की राह में रोड़े अटका रही है. जहाँ तक वोटरों का सवाल है कोई अपनी मुठ्ठी खोलने को तैयार नहीं है. इलाक़े के एक वोटर शंकर भट्टाचार्य कहते हैं कि ‘दोनों उम्मीदवार हर मामले में बराबर हैं. उनमें तमाम समानताएँ हैं और दोनों को देखने के लिए भीड़ जुटती है. राजनीति के मैदान में हीरो व विलेन के बीच इस पहले मुक़ाबले में बाज़ी किसके हाथ रहेगी, इसका पता तो बाद में चलेगा. फ़िलहाल तो लोग इस दिलचस्प मुक़ाबले का मज़ा ले रहे हैं. कभी इस गली से हीरो गुजर रहा है तो कभी सामने वाली गली से विलेन. कहीं आमने-सामने होने पर एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देकर दोनों अपने-अपने रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें शरद यादव जेडी यू के नए अध्यक्ष 11 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस इतिहास बनी दीवार लेखन की कला26 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस कांग्रेस-डीएमके के बीच चुनावी समझौता09 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस दस लाख लोगों के नाम सूची से बाहर02 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस जेएनयू में फिर लहराया लाल झंडा29 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस हिंदू-सिख समुदाय को हैं शिकायतें बहुत06 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस मेरे सपनों का अफ़ग़ानिस्तान13 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस मदरसे से पढ़े लोग नहीं लड़ सकेंगे चुनाव16 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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