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जेएनयू में फिर लहराया लाल झंडा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का छात्रसंघ एक बार फिर वाम के रंग में रंग गया है. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन(आइसा) से छात्रसंघ के अध्यक्ष पद की प्रत्याशी मोना दास ने दोबारा अध्यक्ष पद जीत लिया है जबकि बाकी के तीनों पदों, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव पद पर स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफ़आई) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन (एआईएसएफ़) के प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है. ग़ौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों की तरह ही इस बार भी एसएफ़आई और एआईएसएफ़ ने अपने प्रत्याशी संयुक्त रूप से उतारे थे. उधर छात्रसंघ के केंद्रीय पदों के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद(एबीवीपी) और नेशनल स्टूडेंट्य यूनियन ऑफ़ इंडिया(एनएसयूआई) के प्रत्याशी अपना खाता भी नहीं खोल सके. अलग-अलग स्कूलों के लिए काउंसलर के पदों पर भी अधिकतर पद एसएफ़आई और एआईएसएफ़ के प्रत्याशियों को ही मिले. इसबार के चुनाव में मुध्य रूप से गोहाना, गोधरा और गुड़गांव से लेकर मऊ तक बहस हुई और ईरान, अमरीका, भारत की भूमिकाओं पर भी सवाल उठे. क्या है ख़ास देशभर के बाकी विश्वव्द्यालयों से इतर इस परिसर में होनेवाले चुनाव कुछ ख़ास और हटकर हैं. ख़ास यह है कि चुनाव के मुद्दों और बहसों में परिसर के भीतर से लेकर अंतरराष्ट्रीय विमर्शों तक के सवाल हावी रहते हैं और हटकर है यहाँ की चुनाव की शैली.
दिल्ली विश्वविद्यालय या बाकी तमाम छात्रसंघ चुनावों में जहाँ बेहिसाब पैसा फूँका जाता है और तमाम दल पर्चों, पोस्टरों और बाहुबल का प्रदर्शन करते नज़र आते हैं वहीं जेएनयू के चुनावों में खर्च न के बराबर किया जाता है. आपराधिक छवियों और बाहुबलियों के बजाय वैचारिक और सामाजिक-राजनीतिक रूप से सक्रिय छात्रों को प्रत्याशी बनाया जाता है. छात्र अपने हाथों से बने पोस्टरों से और समसामयिक मुद्दों पर लिखे गए पर्चों से अपना पक्ष रखते हैं और वोट माँगते हैं. चुनावों का पूरा प्रबंधन भी छात्रों की एक समिति के हाथों में होता है. कभी इसी परिसर में छात्र राजनीति से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार हेमंत जोशी बताते हैं कि उनके समय में छात्र इतनी बड़ी तादाद में चुनाव में हिस्सा नहीं लेते थे पर अब तो मतदान और मतगणना तक उत्सव सा माहौल देखने को मिलता है. न गाड़ी, न दावतें और न ही शोर मचाते लाउडस्पीकर, बल्कि मशाल जुलूसों, ढपलियों और ढोलकों की थाप पर क्रांतिकारी गीतों और वैचारिक बहसों के दम पर यहाँ चुनाव होते हैं. ग़ौरतलब है कि इस परिसर ने देश के कई राजनीतिक दलों को शीर्ष नेतृत्व दिया है. प्रकाश कारत, सीताराम येचुरी और दिग्विजय सिंह उनमें से कुछ नाम हैं. संक्रमण काल हालांकि परिसर का यह राजनीतिक चरित्र भी बाहर के प्रभावों से अछूता नहीं है और परिसर की अपनी पहचान इस वक्त संक्रमण के दौर में मालूम देती है. इस बार परिसर के बाहर कुछ बड़े होर्डिंग भी लगे और परिसर में प्लास्टिक के झंडों वाली झालर भी सजी. कुछ दलों ने तो अन्य विश्वविद्यालय से तमाम छात्राओं को परिसर में उनके पक्ष में वोट डालने के लिए बुलाया. इसके अलावा परिसर के चर्चित गंगा ढाबे से लेकर आम सभाओं और प्रसिडेंसियल डिबेट तक बहसों के स्तर में भी कुछ गिरावट आई है. पिछली बार की तुलना में इसबार मतदान भी कम ही हुआ और नए छात्रों में अब झोला-चप्पल-झंडा वाला कलेवर न के बराबर दिखाई दिया. फिर भी, परिसर का चरित्र अब भी देशभर के बाकी छात्रसंघ चुनावों के लिए एक मिसाल तो है ही. | इससे जुड़ी ख़बरें जेएनयू, जवानी और वामपंथ30 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस एएमयू पर बड़ा राजनीतिक विवाद05 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस एएमयू में मुसलमानों को आरक्षण नहीं05 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस भारत-पाक संबंध और युवा | भारत और पड़ोस कारनामा एक विश्वविद्यालय का | भारत और पड़ोस पटना में हिंसक प्रदर्शन | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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