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सैटेलाइट सिनेमाघर से बदल रही है तस्वीर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आपने सिनेमाघरों का प्रोजेक्टर रुम ज़रुर देखा होगा. वहाँ एक भारी भरकम मशीन लगी होती थी और एक फ़िल्म रील उस पर घूमती रहती थी. यदि आपकी स्मृति का प्रोजेक्टर रुम ऐसा ही है और आप होशंगाबाद के मीनाक्षी टॉकीज़ का प्रोजेक्टर रुम देख लें तो एकाएक विश्वास नहीं होगा कि यही प्रोजेक्टर रुम है. अब भारी भरकम मशीनों की जगह एक कंप्यूटर ने ले ली है और इसी से पूरी फ़िल्म दिखाई जा रही है. भोपाल से 80 किलोमीटर दूर होशंगाबाद में मीनाक्षी टॉकीज़ मध्यप्रदेश का पहला सेटेलाईट सिनेमाघर बन चुका है. इसे डिजिटल सिनेमा भी कह सकते हैं. मिनाक्षी टॉकीज़ के मालिक सत्येंद्र फ़ौजदार का कहना है कि अब भारी भरकम पेटियों में रीलों को मुंबई, दिल्ली से होशंगाबाद लाने की ज़रूरत नहीं है. क्योंकि अब फ़िल्म सिनेमाघर तक सैटेलाइट से पहुँच रही है. जैसा कि फ़ौजदार बताते हैं, "मुंबई की डिस्ट्रीब्यूटर कंपनी हमें फ़िल्म डाऊनलोड करती है जो हमारी छत पर लगी छतरी के द्वारा हमारे कंप्यूटर में आ जाती है और हम इसे दर्शकों को सीधे दिखा सकते हैं." इस नई प्रणाली के लिए सिनेमाघर में कई तब्दीलियाँ करनी पड़ी हैं. फ़ौजदार बताते हैं, "हमने पर्दा बड़ा किया, हॉल और मशीन रूम को वातानुकूलित बनाया, दो कंप्यूटर लगाए और एक नया प्रोजेक्टर लगाया."
और इससे क्या फ़ायदा हुआ, यह पूछे जाने पर फ़ौजदार कहते हैं, "डिजिटल सिनेमा बड़े पर्दे पर आवाज़ की स्पष्टता और फ़िल्म पहले के मुक़ाबले चमकदार और ज़्यादा रंगीन दिखाई दे रही है." वे कहते हैं, "जिस दिन नई फ़िल्म रिलीज़ होती है उसी दिन होशंगाबाद में भी हम नई फ़िल्म दिखा देते हैं. सबसे बड़ा फ़ायदा बिजली का बिल एक तिहाई हो गया है क्योंकि आर्कलैंप का झंझट ही ख़त्म हो गया है और फिर दर्शक वापस सिनेमा की ओर लौट रहे हैं." सत्येन्द्र फ़ौजदार कहते हैं कि इस नई तकनीक के आने से 30 प्रतिशत दर्शक बढ़े हैं. लेकिन इसमें सात लाख रूपया निवेश करना पड़ा है और इस पर वे कहते हैं, "आज मैं नुकसान में हूँ पर छह माह बाद मेरा फ़ायदा शुरू हो जाएगा." दर्शक भी ख़ुश सिनेमा घर की टिकट खिड़की पर मिले 65 साल के केके मालवीय ने कहा अभी जो परिवर्तन किया है वह उन्हें बहुत अच्छा लगा. वे कहते हैं, "मैं सिनेमा देखने का पुराना शौकिन हूँ पर देख रहा हूँ कि सभी तबके के लोग डिजिटल सिनेमा पसंद कर रहे हैं. जब मैं छोटा था नौ साल का तब मैंने पहली फ़िल्म यहूदी देखी थी. आज भी पुरानी फ़िल्में व गाने मुझे पसंद है. अभी होशंगाबाद में बागवान डिजिटल पर मिनाक्षी में देखी, क्या आवाज़, क्या पिक्चर क्वालिटी, बस मज़ा आ गया. लेकिन अभी शहर में इसका पूरी तरह प्रचार नहीं हुआ है." दूसरे दर्शक अशोक कुमार ने भी माना कि डिजिटल फ़िल्म देखकर उन्हें मज़ा आया.
और इससे सिर्फ़ दर्शक ही ख़ुश नहीं हैं वो लोग भी ख़ुश हैं जिन्हें पुराने प्रोजेक्टर से छुट्टी मिल गई है. मिनाक्षी टॉकीज़ में मशीनमैन विजय साहू ने कहा कि पुराने प्रोजेक्टर में उन्हें फ़िल्म वापस लपेटना पड़ता था जिससे फ़िल्म में स्क्रैच पड़ जाते थे जो पर्दे पर दिखते थे. वे ख़ुश होकर कहते हैं, "अब तो मुझे सिर्फ एक बटन दबाना है, उधर सिनेमा चालू. इंटरवल में भी एक बार बटन दबाना पड़ता है. मुंबई की कंपनी ने हमको कोड नंबर दे रखा है, उन्हें फोन कर कोड नंबर बताते हैं वे फ़िल्म डाऊनलोड कर देते हैं." वैसे मीनाक्षी सिनेमा प्रदेश का अकेला डिजिटल सिनेमाघर नहीं है क्योंकि इसके बाद बैतूल में भी एक सिनेमाघर में यह तकनीक अपना ली गई है. | इससे जुड़ी ख़बरें डिज़्नी का पिक्सर को ख़रीदने का फ़ैसला24 जनवरी, 2006 | मनोरंजन जंगल में फंस गए जानवर03 अक्तूबर, 2005 | मनोरंजन सिनेमाघरों का रुख़ करने लगे हैं लोग11 जुलाई, 2004 | मनोरंजन आख़िरी साँस लेती एक कला27 फ़रवरी, 2004 | मनोरंजन उपग्रह जानकारी से बनेगी शराब19 जुलाई, 2003 | विज्ञान डिजिटल तकनीक से रोज़ी ख़तरे में17 मार्च, 2004 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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