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शैक्षिक संस्थाओं में आरक्षण पर राजनीति

विद्यार्थी
शिक्षण संस्थानों में आरक्षण को लेकर राजनीति चल रही है
निजी शैक्षिक संस्थानों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के आरक्षण के विधेयक टाल दिया गया.

इस वर्ष जनवरी में राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की एक बैठक के बाद यह तय हुआ था कि निजी व्यावसायिक शैक्षिक संस्थाओं के नियंत्रण के लिए एक विधेयक पेश किया जाएगा.

लेकिन फिर आया उच्चत्तम न्यायालय का फ़ैसला और संसद और न्यायालय के बीच एक खाई सी आ गई.

एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई और यह तय हुआ कि न्यायालय के रवैये के विपरीत, अब संसद तय करेगी कि निजी शैक्षिक संस्थाओं में भी आरक्षण होगा, भले ही वे सरकार से सहायता पाते हों या नहीं.

एक विधेयक का मसौदा तैयार हुआ जिसमें यह प्रावधान था कि सिवाय अल्पसंख्यक संस्थाओं के सभी प्रकार की निजी संस्थाओं में अनुसूचित जातियों,जनजातियों और पिछड़े वर्ग के प्रत्याशियों के लिए आरक्षण का प्रावधान होगा.

विरोध

भाजपा का कहना है कि उसे यह स्वीकार नही है कि अल्पसंख्यक संस्थाओं को अपवाद बनाया जाए.

एनसीईआरटी के पूर्व प्रमुख जेएस राजपूत कहते हैं कि शिक्षा में आरक्षण लागू होना चाहिए. लेकिन वो अल्पसंख्यक संस्थानों को इसका अपवाद बनाए जाने के पक्ष में नहीं हैं.

 इस विधेयक के अलावा कई अन्य बड़े सवाल हैं जैसे फ़ीस के नाम पर मोटी रकम वसूलने जैसे मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण हैं
अनिल सदगोपाल, शिक्षाविद्

लेकिन कांग्रेस कार्यसमिति के पर्यवेक्षक और काफ़ी समय अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जुड़े रहे वसीम अहमद का मानना है कि इस बात की ज़रूरत है कि अल्पसंख्यक संस्थाओं को अलग नज़रिए से देखा जाए.

लेकिन एक दिलचस्प बात यह है कि 30 पिछड़े सांसदों की बैठक हुई जिसमें यह माँग उठी कि उन्हें पिछड़े वर्ग के स्थान पर पिछड़ी जाति कह कर संबोधित किया जाए.

हालांकि केरल के सांसदों को धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थाओं को अलग रखने पर कोई आपत्ति नही है,पर भाषाई अल्पसंख्यक संस्थाओं को अलग रखने में उन्हें बहुत ऐतराज़ था.

इस विधेयक में बहुत कुछ ऐसा है जिस पर अन्य वर्गों को अलग अलग कारणों से आपत्ति है.

कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि इस विधेयक में जो ज़रूरी नियंत्रण का प्रावधान होना चाहिए वो नही है.

अनिल सदगोपाल ने शिक्षा क्षेत्र में कई वर्षों तक काम किया है. उनका कहना है कि इस विधेयक के अलावा कई अन्य बड़े सवाल हैं.

जैसे फ़ीस के नाम पर मोटी रकम वसूलने का मुद्दा और ये संस्थान क्या पढ़ा रहे हैं, ये सवाल भी महत्वपूर्ण है.

कुल मिलाकर जो बात सामने आई है,वह यह है कि इस विधेयक के पहले जो चर्चा और जिस संवाद की आवश्यकता है वह अभी तक हुआ ही नहीं है.

वैसे ख़बरें हैं कि यह विधेयक एक बार फिर पेश हो सकता है.

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