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'निजी कॉलेजों में कोटे का अधिकार नहीं'
सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने निजी संस्थानों में कोटा निर्धारित करने से इनकार कर दिया है
सुप्रीम कोर्ट ने निजी इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में दाखिलों के संबंध में अपने फ़ैसले में कहा है कि सरकार को इन संस्थानों में कोटा तय करने का अधिकार नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय खंडपीठ ने कहा है कि ग़ैरसहायता प्राप्त, सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक और निजी कॉलेजों में प्रवेश का कोटा तय करने में सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेरिट सूची की अनदेखी करे बगैर, निजी संस्थान अनिवासी भारतीयों के लिए 15 फ़ीसदी कोटा निर्धारित कर सकते हैं.

यदि इस कोटे से सीटें बची रहती हैं तो समाज के कमज़ोर तबके के लोगों से उन्हें भरा जाना चाहिए.

अदालत का कहना था कि एनआरआई कोटे से जमा धनराशि से ग़रीब छात्रों की मदद की जानी चाहिए.

मुख्य न्यायाधीश आरसी लोहाटी की अध्यक्षतावाली खंडपीठ ने व्यवस्था दी कि निजी शिक्षण संस्थानों को छात्रों को प्रवेश देने की प्रक्रिया निर्धारित करने का अधिकार है.लेकिन यह प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए.

दूरगामी फ़ैसला

अल्पसंख्यक संस्थानों के विषय में सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि संस्थान अपने यहाँ ग़ैरअल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों सहित किसी भी वर्ग के छात्रों को प्रवेश दे सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए कि संस्थान का अल्पसंख्यक चरित्र ही बदल जाए.

अदालत ने कहा कि छात्र समुदाय के हितों को ध्यान में रखते हुए और योग्यता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इन शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए केंद्रीयकृत एकल व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी स्थिति में योग्यता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए.

अदालत का कहना था कि शिक्षण संस्थान को फ़ीस तय करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन कैपिटेशन फ़ीस की रोकथाम के लिए इसे नियंत्रित किया जा सकता है.

निजी मेडिकल कॉलेजों की एसोशिएसन के पूर्व अध्यक्ष और सांसद आरएल जलप्पा का कहना था कि वो इस फ़ैसले का स्वागत करते हैं.

उनका कहना था कि वो नहीं मानते हैं कि इस फ़ैसले से इन कॉलेजों की फ़ीस बढ़ेगी.

लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय अध्यापक संघ के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र शर्मा ने इस फ़ैसले को जनविरोधी बताया.

उनका कहना था कि अब पैसेवालों के बच्चे ही इन कॉलेजों में पढ़ पाएंगे.

वीरेंद्र शर्मा का कहना था कि ये संस्थान रियायती दर पर तो ज़मीन हासिल करते हैं पर ग़रीबों के बच्चों को दाखिला नहीं देते हैं.

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