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सीमा शेखर एक नई प्रतीक हैं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चरमपंथियों और सुरक्षा बलों के बीच सालों से जारी हिंसा से आहत जम्मू-कश्मीर की महिलाओं के लिए सीमा शेखर एक नई प्रतीक हैं. सीमा शेखर इस राज्य की पहली महिला अतिरिक्त महाधिवक्ता नियुक्त हुई हैं. राज्य में चुनौतीपूर्ण ज़िम्मेदारियों में शुमार इस दायित्व को स्वीकार करने में वह बहुत खुश हैं और उत्साह से भरी हुई हैं. उनके मुताबिक़, “किसी भी तरह का नया काम अपने कंधे पर लेना बड़ी भारी ज़िम्मेदारी होती है.” सीमा शेखर कहती हैं, “मुझे अपने आपको साबित करना पड़ेगा ताकि दूसरी महिलाओं के लिए भी रास्ता खुल सके.” सीमा दो दशकों से वकालत कर रही हैं. इस दौरान उन्होंने सरकारी वकील के रूप में भी काम किया है. सीमा उस क्षण को कभी नहीं भूली हैं जब प्रसव पूर्व जाँच के खिलाफ़ दर्ज उनकी याचिका पर फैसला उनके हक़ में सुनाया गया था. सरकारी वकील के रूप में भी उन्होंने बहुत से मामले जीते हैं. चालीस वर्ष की हो चलीं सीमा पूरे आत्मविश्वास के साथ कहती हैं कि राज्य में महिलाओं के साथ जारी भेदभाव के बावजूद वह ख़ुद को साबित करने में सफल होंगी. चारदीवारी से बाहर वह ख़ुश हैं कि अब महिलाओं को चारदीवारी में रखने की मानसिकता में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है. वह कहती हैं, “इसी का नतीजा है कि मैं आज यहाँ हूँ”. वकालत के अलावा कुछ सामाजिक संगठनों से भी जुड़ी रहीं सीमा को इस बात से पीड़ा होती है कि राज्य की महिलाओं को पूरा न्याय नहीं मिल पाता. सीमा कहती हैं, “महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. मैं इसके लिए संघर्ष करुंगी.” सीमा स्वीकार करती हैं कि राज्य में सालों से जारी अशांति के कारण तमाम क्षेत्रों में महिलाएँ काफ़ी पिछड़ गईं. उनके मुताबिक, "हमने कश्मीर में जारी उग्रवाद के दौरान महिलाओं को दमन का शिकार होते देखा है. इसका असर प्रगति और विकास पर भी पड़ा." सीमा अब मानती हैं कि राज्य की महिलाओं को अपनी प्रगति और अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ेगा. पुरुषों से कम नहीं सीमा राज्य के एक पूर्व पुलिस अधिकारी की बेटी हैं. वकालत को करियर के रूप में अपनाने के बारे में उन्होंने सोचा नहीं था. वो ख़ुद भी प्रशासनिक सेवा में जाना चाहती थीं, लेकिन कामयाब नहीं हो सकीं. उनके पिता राज्य के पुलिस प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे.
सीमा अपनी सारी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं. वह कहती हैं कि उनके माता-पिता ने ही उन्हें सिखाया कि कुछ बेहतर हासिल करने के लिए किस तरह संघर्ष करना पड़ता है. सीमा कहती हैं, “मेरी परवरिश ऐसे माहौल में हुई, जहाँ लड़की होना पाप नहीं माना जाता था, बल्कि हमें हमेशा सिखाया गया कि हम पुरुषों से कम नहीं.” वह अपने माता-पिता की तीन बेटियों में सबसे बड़ी हैं. सीमा कहती हैं कि तीनों बहनों को हमेशा शिखर पर पहुँचने के लिए प्रेरित किया गया. अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ीं सीमा ने जम्मू विश्वविद्यालय से क़ानून की डिग्री ली है और वे 1986 से प्रैक्टिस कर रही हैं. सीमा के पति भी वकील हैं और उनके दो बच्चे हैं. सीमा के मुताबिक वकालत का पेशा काफी थका देने वाला होता है. वह जम्मू के हिंदू ब्राह्मण परिवार से हैं, लेकिन पिता की पोस्टिंग की वजह से उनका बचपन कश्मीर में बीता. | इससे जुड़ी ख़बरें मर्केल बनेगीं पहली महिला चांसलर10 अक्तूबर, 2005 | पहला पन्ना महिलाओं की दुनिया किसके हाथ में30 सितंबर, 2005 | पहला पन्ना पहली बार कुवैती महिलाएँ नगर परिषद में05 जून, 2005 | पहला पन्ना मुस्लिम महिला ने पढ़ाई नमाज़18 मार्च, 2005 | पहला पन्ना 'युद्ध का ख़ामियाज़ा महिलाएँ भुगतती हैं'08 दिसंबर, 2004 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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