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वीरप्पन की कब्र पर पहुँचते हैं लोग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चंदन तस्कर वीरप्पन की मौत को एक साल हो गया है. तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों की सीमा से लगे पहाड़ी इलाकों से विशेष पुलिस दल के दस्ते हट गए हैं. सत्यमंगलम के जंगलों के कुछ हिस्सों में गाँव वाले फिर से अपने जानवर चराने लगे हैं. पंद्रह साल के बाद, इस क्षेत्र में शांति फिर आई है. कोलाथूर के निकट पेरियार नदी के तट पर बने एक छोटे से कब्रिस्तान में वीरप्पन की मट्टी की कब्र को देखने अभी भी लोग आते हैं. शनिवार और रविवार को उत्सुक लोगों की भीड़ जमा होती है. विशेष पुलिस दल के सदस्य तमिलनाडु सरकार से मिली ज़मीन पर अपने नए घर बना रहे हैं. वीरप्पन के मारे जाने के बाद मुख्यमंत्री जयललिता ने हर एक सदस्य को ज़मीन का पट्टा दिया और नकद राशि पुरस्कार में दी. लेकिन कोलाथूर और मेतापलइयूर के गाँवों में करीब 300 लोगों ने इंसाफ़ की अपनी लड़ाई तेज़ कर दी है. यह वे लोग हैं जो कि पुलिसकर्मियों और वीरप्पन की लड़ाई के बीच फंस गए थे. दुखी लोग इनके गाँव जंगलों के निकट हैं और यह सभी पुलिस के शक के दायरे में रहे. इनका कहना है कि वीरप्पन की खोज में दोनों ही राज्यों के पुलिसकर्मियों ने इन पर 1992 से 1995 के बीच "घोर अत्याचार" किए.
रात के अंधेरे में पूरे गाँव खाली करवाए जाते थे. हाथ-पाँव बाँधकर उन्हें गुप्त स्थानों पर ले जाकर उनके शरीर पर बिजली का करंट लगाया जाता था. महिला, पुरूष, नौजवान और बच्चे सभी पुलिस का शिकार रहे. हमारी इनमें से कुछ लोगों से कोलाथूर में एक पुनर्वास केंद्र में मुलाकात हुई. सभी की कहानियाँ मिलती-जुलती हैं, हाथ-पाँव बाँधकर शरीर के अलग-अलग हिस्से में करंट देना, महिलाओं के साथ बलात्कार, औरतों के सामने उनके पति की हत्या. कइयों को आतंकवाद विरोधी क़ानून टाडा के अंदर महीनों और सालों तक ज़ेल में रखा गया. इनका कहना है कि इन्होंने न कभी वीरप्पन को देखा और न ही उसकी कोई मदद की. लेकिन 1992-1995 तक पुलिस ने इन लोगों को सलाखों के पीछे रखा. फ़रियाद इन 10 साल में कई ज़मानत पर बाहर हैं, कई अभी भी कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं, मगर प्रशासन की ओर से उन्हें कोई राहत नहीं मिली है.
37 वर्षीय वली का कहना है कि उसके सामने उसके पति की जान ली गई. साढ़े आठ साल उसने जेल में काटे, उसके साथ बलात्कार हुआ. आज उसकी 12 वर्षीय लड़की उसे माँ नहीं पुकारती. वह अब कुली का काम कर अपना पेट भर रही है. 56 वर्षीय चिदानंद ने 24 दिन विशेष पुलिस दल की क़ैद में काटा. 2001 में उन्हें बेगुनाह करार दिया गया. आज उन्हें दस रुपए उधार देने से लोग कतराते हैं. चिदानंद बताते हैं कि लोग उन पर भरोसा नहीं करते. डेढ़ साल पहले वली और चिदानंद जैसे लोगों ने अपने लिए न्याय की लड़ाई शुरू की. तमिलनाडु के तीन स्वयंसेवी संगठन और कर्नाटक के दो संगठनों ने इन लोगों को संगठित करने का काम शुरू किया. आख़िर में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जाँच शुरू की. वीरप्पन के जीवित रहते हुए यह रिपोर्ट तैयार की गई. रिपोर्ट की प्रति दोनों सरकारों के पास है. इन लोगों को न एक पैसा मुआवज़े में मिला है और न ही किसी दोषी पुलिसकर्मी को सज़ा. मीडिया में भरपूर प्रचार से विशेष पुलिस दल के दस्तों ने वीरप्पन की खोज में अपने काम करने के तरीके को बदल दिया. वीरप्पन को मरे अब एक साल हो गया है और ये लोग सरकार से न्याय माँग रहे हैं, अपने मानवाधिकारों के हनन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं. लेकिन अब तक इनकी आवाज़ सरकार तक नहीं पहुँची है. |
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