|
'सौ से ज़्यादा रिश्तेदारों को खोया है मैंने' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मैं पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद का रहने वाला हूँ और काफ़ी अर्से से लंदन में रह रहा हूँ. शनिवार को पहले कराची से ख़बर आई कि पाकिस्तान में भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं. फिर यह ख़बर मिली कि यह सब कुछ वहीं हुआ है जहाँ मेरे परिवार के लोग मौजूद हैं. मैंने उनसे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन फ़ोन नहीं मिल रहे थे. छह घंटे की कोशिश के बाद कुछ रिश्तेदारों से बात हो पाई. जो इत्तिलाएँ मिलीं उन्होंने तो जैसे होश ही उड़ा दिए. मेरे ख़ानदान का एक तरह से सफ़ाया ही हो गया था. धीरे-धीरे एक-एक के मरने की इत्तिला मिलती रही और शाम होते-होते पता चला कि कुल मिला कर मेरे सौ रिश्तेदार हलाक हो चुके हैं. कुछ लोगों का तो पता ही नहीं चला. घर में हर तरफ़ रोना-धोना मच गया, जिस-जिस को पता चला वह संवेदना ज़ाहिर करने आता रहा. मेरे बहनोई की माँ, भाई, बहन, सभी की मौत हो चुकी थी. उन्हें किसी तरह विमान में सवार कराया ताकि वह उनके अंतिम दर्शन कर सकें. फिर पता चला कि लोगों को दफ़न करने में दिक़्क़त आ रही है क्योंकि कफ़न कम पड़ रहे थे. रावलपिंडी से ख़रीद कर कफ़न भिजवाए. पता चला कि 19 लोगों को एक ही क़ब्र में दफ़नाया गया है. अब हम यहाँ से तंबुओं का इंतज़ाम कर रहे हैं. यहाँ से डॉक्टरों को भी भेजने की कोशिश की जा रही है. अब तो रोते-रोते आँसू भी सूख गए हैं. आख़िर किस-किस के लिए रोएँ. रमज़ान के महीने में हुआ है यह हादसा. बस ख़ुदा से यही दुआ है कि मरने वालों को जन्नत नसीब करे और जो ज़िंदा हैं उनकी मदद करे. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||