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केंद्र सरकार ने बूटा का बचाव किया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह का ज़ोरदार बचाव करते हुए कहा है कि उन्होंने 'उचित और निष्पक्ष' फ़ैसला करते हुए विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश की थी. केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए सॉलिसिटर जनरल जीई भानवती ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, "अगर राज्यपाल ने पार्टियों से सरकार बनाने को कहा होता तो यह भ्रष्टाचार को क़ानूनी शक्ल देने का काम होता." विपक्षी एनडीए गठबंधन के विधायकों ने आरोप लगाया है कि राज्यपाल ने राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित होकर विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश की थी. पाँच सदस्यीय खंडपीठ के सामने महाधिवक्ता ने कहा, "बिहार के राज्यपाल ने दोहराया है कि किसी तरह जोड़तोड़ से सरकार बनवाने से बेहतर निर्णय यही था कि राज्य की जनता को एक और मौक़ा दिया जाए." जजों की ओर से सवालों की बौछार के बीच जीई भानवती ने राज्यपाल का बचाव करते हुए कहा, "वे (राज्यपाल) इस बात को लेकर चिंतित थे कि राजनीतिक व्यवस्था को विकृत होने से बचाया जाए, व्यवस्था की विकृति भारतीय लोकतंत्र में कैंसर की तरह है." जब उनसे जजों ने पूछा कि बूटा सिंह के फ़ैसले का आधार क्या था तो उन्होंने कहा, "संविधानिक पद पर बैठा कोई व्यक्ति अगर निर्णय लेता है तो उसके पास कोई न कोई आधार ज़रूर होता है." सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी की है, "कोई आज मुख्यमंत्री है और कल राज्यपाल बना दिया जाता है, आदमी कोई मशीन नहीं है, दुर्भाग्यवश वह राज्यपाल बनने के बाद भी वह राजनीतिक एजेंडा चलाता है, संविधानिक पद तुष्टीकरण के पद बन गए हैं." जब सॉलिसिटर जनरल से पूछा गया कि क्या राज्यपाल बूटा सिंह ने विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश करने में जल्दबाज़ी नहीं की, तो उन्होंने इतना ही कहा कि वे "विधायकों की ख़रीद-फ़रोख्त को रोकना चाहते थे." चुनाव बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र अदालत ने इस मामले की सुनवाई तय तारीख़ से पहले शुरू कर दी है. इस मामले में तेज़ गति से सुनवाई करने का निर्णय करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए सिर्फ़ तीन दिन का समय दिया है. अदालत का कहना है कि 29 सितंबर तक इस मामले की सुनवाई समाप्त हो जाएगी और फ़ैसला हर हाल में बिहार में चुनाव से काफ़ी पहले कर दिया जाएगा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव पर स्थगनादेश देने से इनकार कर दिया है और कहा है कि चुनाव तय कार्यक्रम के हिसाब से ही होंगे. मगर अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की रिपोर्ट को संविधान सम्मत नहीं पाया तो क्या होगा, क्योंकि इसी रिपोर्ट के आधार पर विधानसभा भंग की गई थी जिसके परिणामस्वरूप वहाँ चुनाव हो रहे हैं. अब सबकी नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि अगर राज्यपाल को ग़लत मंशा से निर्णय करने का दोषी माना गया तो क्या बिहार में होने वाले चुनाव रद्द कर दिए जाएँगे और पिछली विधानसभा बहाल की जाएगी या नहीं. |
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