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सेन्सेक्स नहीं संवेदनशील 'सेन्स' ज़रूरी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विसंगति का इससे ज्यादा सटीक उदाहरण शायद ही कोई हो. आठ सितंबर को मुंबई शेयर बाजार के संवेदनशील सूचकांक ने आठ हजार का अंक ढोल-धमाके के साथ पार किया और एक दिन पहले यानी सात सितंबर को यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट 2005 प्रकाशित हुई. रिपोर्ट से यही साफ़ हुआ कि शेयर बाजार के सूचकांक को भले ही कितना ही संवेदनशील माना जाए पर भारत का आर्थिक विकास उन क्षेत्रों के प्रति संवेदनशील नहीं रहा है जिन्हें अर्थव्यवस्था के कमजोर पक्षों के तौर पर चिन्हित किया जा सकता है. यूएनडीपी की रिपोर्ट ने दिखाया है कि विकास के कई सामाजिक मानकों के मामले में बंगलादेश तक भारत से आगे निकल गया है. मोटे तौर पर इसका आशय यह है कि भले ही संवेदनशील सूचकांक आठ हजार के पार चला जाए पर उस देश को विकसित और संवेदनशील कहलाने का कोई हक नहीं है जिसके एक हजार शिशुओं में से 63 की समय से पहले मौत हो जाती है. बंगलादेश ने यह आंकड़ा गिराकर 46 कर लिया है. इस रिपोर्ट ने जिस एक मुद्दे को बहुत मज़बूती से रेखांकित किया है, वह यह है कि आखिर विकास का मतलब क्या है. इस रिपोर्ट से पहले भी यह बात साफ होती रही है कि बढ़ी हुई आय का यह मतलब कतई नहीं होता कि समाज अपने सारे पक्षों पर ध्यान दे रहा है. और कम आय का मतलब कतई नहीं होता कि वहां रहने वाले सारे लोग परेशानहाल ही हैं. बहस इस रिपोर्ट के बाद इस बहस में तेजी आनी चाहिए कि क्यों बावजूद सारे विकास के दावों के हम अपनी बच्चियों को सुरक्षित नहीं रख पाते.
बांग्लादेश के कई मामलों में भारत के आगे जाने के आंकड़ों से पहले जो आंकड़े भारत में उपलब्ध हैं, उनसे यही लगता है कि कई मामलों में आर्थिक विकास और सामाजिक विकास का रिश्ता लगभग उलटा होता है. 2001 की जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक रुप से अपेक्षाकृत विकसित समझे जाने वाले पंजाब में प्रति 1,000 लड़कों के मुकाबले हजार में से 207 लड़कियां कम हैं. हरियाणा में प्रति एक हजार लड़कों के मुकाबले 180 लड़कियां कम हैं, देश की राजधानी में प्रति एक हजार लड़कियों के मुकाबले 135 लड़कियां कम हैं. ये कम यूं हैं कि कई अजन्मी कन्याओं के मां-बाप नहीं चाहते कि ये जन्म लें और उधर अपेक्षाकृत गरीब उत्तर प्रदेश में एक हजार लड़कों के मुकाबले 85 लड़कियां ही कम हैं. दिल्ली में कुछ समय पहले हुए एक अध्ययन से पता चला था कि कन्याओं की भ्रूण हत्या दिल्ली की उन इलाक़ों में ज्यादा है, जिने बहुत पॉश कॉलोनी कहा जाता है, झुग्गी वाले अपनी बेटियों को इस तरह से नहीं मारते. यानी गरीबी का भ्रूण हत्या से रिश्ता नहीं है उसका रिश्ता मानसिकता से है, जो सिर्फ सेनसेक्स के ऊपर जाने से नहीं बदल सकती. विकास अगर अपनी बेटियों को भी सुरक्षित रखने का सामर्थ्य नहीं पैदा कर सकता तो उस विकास को दोबारा परिभाषित किया जाना चाहिए, उस पर दोबारा बहस होनी चाहिए. यूएनडीपी की रिपोर्ट ने यह मौका दिया है, फिलहाल इस देश को सेनसेक्स के विकास की नहीं, संवेदनशील सेन्स के विकास की जरुरत है. बेहतर यह हो कि हर महीने सेन्सेक्स सूचकांक की रिपोर्ट के साथ, अशिक्षा, कन्या भ्रूण हत्या, जैसे मसलों की भी समीक्षा हो तब ही उस पर सतत बहस की स्थिति बन पाएगी. |
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