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'जातीय घृणा दूर करने के लिए आंदोलन ज़रूरी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरा मानना है कि हरियाणा में दलितों के घर जलाना घोर निंदनीय है. बहाना दिया जा रहा है कि इसके पहले एक हत्या पहले हुई थी. लेकिन जवाब में ऐसा काम किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता है. हर गाँव में ऐसा बहाना करके ऐसी घटनाएँ हो सकतीं है. यह ठीक है कि जिसने हत्या की और जिन्होंने घर जलाए दोनों को सज़ा होनी चाहिए. दरअसल जाति व्यवस्था एक श्रेणीबद्ध व्यवस्था है. उच्च जातियों में निम्न जातियों के प्रति घृणा की भावना निहित रहती है. और जहाँ घृणा होगी वहाँ हिंसा भी होगी. यही निहित घृणा की भावना हिंसा के रूप में नज़र आती है. लोगों को क़ानून से तो सुरक्षा देनी ही होगी. साथ ही शिक्षा और सामाजिक सुधार के आंदोलन चलाने की बहुत आवश्यकता है. देश में धर्म और जाति की राजनीति का बोलबाला है. उसमें अपराधी भी घुस जाते हैं. कुछ संगठन अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते हैं ताकि हिंदुओं को एकजुट किया जा सके. तो कुछ दल अपनी जाति और अल्पसंख्यकों का समर्थन जुटाने में लगे रहते हैं. समाज को इस तरह बांटा जाएगा तो टकराव तो होगा ही. दरअसल जाति का आधार है जन्म. और जन्म की नींव विवाह से है इसलिए जब तक अंतरजातीय विवाह नहीं होंगे तब तक जाति व्यवस्था और निहित घृणा जानेवाली नहीं है. मेरा मानना है कि जब तक जाति आधार नहीं टूटता है तब तक यह सामाजिक समस्या खत्म होनेवाली नहीं है. अमेरिका का उदाहरण हमारे सामने है. वहाँ विभिन्न जातीय गुट थे लेकिन अंतरजातीय विवाह होने से वह एक राष्ट्र बना. यह सही है कि भारत में समस्या बहुत बड़ी है और इसका समाधान जल्द होनेवाला नहीं है. मेरा सुझाव है कि सरकार को अंतरजातीय विवाह करनेवालों को प्रोत्साहन देना चाहिए. जैसे उनके बच्चों को कुछ लाभ मिले क्योंकि यह तो तय है कि केवल क़ानून बनाकर इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) |
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