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'चुनाव आयोग को दिशा-निर्देश नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार में चुनाव कार्यक्रम घोषणा के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कोई भी दिशा निर्देश देने से इंकार कर दिया है. संवैधानिक रुप से जटिल और दिलचस्प यह मामला बुधवार को सामने आया जब चुनाव आयोग ने कहा कि वह अगले तीन चार दिनों में बिहार चुनाव का कार्यक्रम घोषित कर सकता है. दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के राज्यपाल के फ़ैसले पर दायर याचिका से जुड़े मामले को संविधान पीठ को भेज दिया है और इसकी सुनवाई छह सितंबर को होनी है. इस संविधान पीठ को यह फ़ैसला करना है कि क्या राज्यपाल के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो सकती है? उल्लेखनीय है कि बिहार विधानसभा भंग करने के केंद्र सरकार के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोटी की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पीठ इसकी सुनवाई कर रहा है. इसी पीठ ने पहले तो केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या राज्यपाल की विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश को सार्वजनिक किया जा सकता है. इस पर केंद्र सरकार ने हामी भरते हुए कहा कि अपवाद के रुप में ऐसा करने को तैयार है. संविधान पीठ संविधान पीठ को मुख्य रुप संविधान की धारा 361 के तहत राज्यपाल को प्राप्त संरक्षण से जुड़े सवालों पर विचार करना है. संविधान पीठ यह भी विचार करेगा कि यदि राज्यपाल पर आरोप लगाया जाए कि उसने दुर्भावनापूर्ण रुप से संवैधानिक अधिकारों का उपयोग किया तो क्या इस मामले में राज्यपाल को भी वादी बनाया जा सकता है? पाँच सदस्यों वाले संविधान पीठ को यह भी विचार करना है कि विधानसभा के नवनिर्वाचित सदस्यों और मंत्रिमंडल को शपथ न दिलवा पाना क्या राज्यपाल की संवैधानिक विफलता है? और आख़िरी सवाल यह है कि राज्यपाल यदि संवैधानिक ज़िम्मेदारियों का पालन करने में विफल रहते है तो भी क्या आदेश निर्देश राज्यपाल की जगह केंद्र सरकार को दिए जाएँ? संविधान की धारा 361 में कहा गया है कि राष्ट्रपति, राज्यपाल या राजप्रमुख अपने पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्य पालन के दौरान किए गए किसी भी कार्य के लिए किसी भी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा. चुनाव प्रक्रिया दूसरी ओर चुनाव आयोग ने संकेत दिए थे कि वह अगले तीन चार दिनों में बिहार में चुनाव प्रक्रिया शुरु करने की अधिसूचना जारी कर सकता है.
23 मई को केंद्र सरकार ने बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने का फ़ैसला किया था और इसके बाद बिहार की स्थिति का दौरा करने के बाद चुनाव आयोग ने कहा था कि चुनाव अक्तूबर-नवंबर से पहले नहीं हो सकते. बिहार के मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह चुनाव आयोग के लिए कोई दिशा निर्देश जारी नहीं कर रहा है. संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार यदि चुनाव आयोग एक बार अधिसूचना जारी कर देता है तो फिर चुनाव की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के मामले के बाद आयोग चुनाव प्रक्रिया शुरु करेगा या नहीं. |
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