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नदियों को जोड़ने की परियोजना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश मुख्यमंत्रियों ने केन और बेतवा नदियों को जोड़ने के सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. आख़िर नदियों को जोड़ने की योजना क्या है? भारत में प्रस्तावित 30 नदियों को जोड़ने की परियोजनाओं में से केन और बेतवा लिंक परियोजना को सबसे अधिक प्राथमिकता दी गई है. इस परियोजना में केन घाटी के अतिरिक्त पानी को बेतवा घाट के कम पानी वाले इलाक़े में ले जाने की व्यवस्था है. इस परियोजना के तहत मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले में 100 वर्ष पुराने गंगऊ बाँध के नज़दीक दौधन बाँध बनाया जाएगा ताकि दोनों राज्यों की सिंचाई सुविधाएँ बढ़ाई जा सकें. दौधन बाँध पर एक पनबिजली परियोजना भी स्थापित की जाएगी ताकि बिजली भी पैदा की जा सके. इसके अलावा दौधन बाँध से परीछा वीयर तक क़रीब 231 किलोमीटर लिंक नहर भी बनाई जाएगी जोकि मध्य प्रदेश द्वारा प्रस्तावित चार परियोजनाओं के लिए पानी की प्रतिपूर्ति करेगी. प्रभावित क्षेत्र इस योजना से उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले को तो अतिरिक्त पानी मिलेगा लेकिन झाँसी, जालौन और हमीरपुर की सिंचाई व्यवस्था प्रभावित होगी. लेकिन उसकी प्रतिपूर्ति राजघाट और अन्य जलाशयों से की जाएगी. इसके अलावा राजघाट और माताटीला बाँध के बिजलीघरों के बिजली उत्पादन में कमी आएगी जिसकी आपूर्ति मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश को करेगा. इस परियोजना से मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना ज़िलों में 323 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की जा सकेगी. साथ ही बेतवा ज़िले के विदिशा और रायसेन ज़िलों में भी सिंचाई के लिए धन उपलब्ध रहेगा. इस परियोजना से क़रीब 8650 हेक्टेयर क्षेत्र के पानी में डूबने की संभावना है जिसमें 6400 हेक्टेयर वन क्षेत्र होगा. आशंका व्यक्त की जा रही है कि इससे 10 गाँवों के क़रीब नौ हज़ार व्यक्ति प्रभावित होंगे. पर्यावरणविदों ने केन और बेतवा नदियों को जोड़ने के समझौते पर चिंता ज़ाहिर की है और योजना का विरोध भी किया है. उनका मानना है कि यह परियोजना न केवल अव्यावहारिक है बल्कि इससे पानी की समस्या घटने के बजाय बढ़ेगी. |
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