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जल विवाद में सुप्रीम कोर्ट का नोटिस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पंजाब के अपने पड़ोसी राज्यों के साथ जल वितरण संबंधित समझौते रद्द करने पर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद सरकार और छह राज्यों को नोटिस जारी किया है. ये नोटिस राष्ट्रपति के इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय से राय माँगने पर केद्र सरकार, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर को जारी किया गया है. सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और राज्यों को छह सप्ताह के भीतर इस विषय से संबंधित सभी तथ्यों और अपना-अपना पक्ष उसके सामने रखने को कहा है. मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोटी की अध्यक्षता में गठित पाँच सदस्यों की खंडपीठ ने सोमवार को ये नोटिस जारी किया. राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय से राय माँगी है कि क्या पंजाब विधानसभा का पारित क़ानून संविधान के अनुसार है, क्या इससे पंजाब सरकार 1981 के जल समझौते की ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो गई है? ये भी पूछा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के 15 जनवरी 2002 के पंजाब को आदेश कि वह सतलुज-यमुना नहर बनाए, पर नए क़ानून का क्या असर होगा? इससे पहले इस मुद्दे से पंजाब और हरियाणा राज्यों की सरकारों रिश्तों पर असर पड़ा है. जहाँ हरियाणा विधानसभा में काँग्रेस के सभी 19 विधायकों ने अपने इस्तीफ़े पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष को सौंपे वहीँ भाजपा के सभी छह विधायकों ने विधानसभा से त्यागपत्र दे दिए. उधर हरियाणा के मुख्यमंत्री और इंडियन नेशनल लोकदल के अध्यक्ष ओमप्रकाश चौटाला ने केंद्र सरकार पर पंजाब सरकार से मिलीभगत का आरोप लगाया है. उन्होंने माँग की कि 'असंवैधानिक कदम उठाने पर' पंजाब सरकार को बर्खास्त किया जाना चाहिए. संसद में भी ये मामला उठा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि पंजाब हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों से मिलकर वे इस समस्या का हल निकालेंगे. |
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