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मंगलवार, 16 अगस्त, 2005 को 15:06 GMT तक के समाचार
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जनरल ज़ियाउल हक़ की मौत से पहले
जनरल ज़ियाउल हक़
जनरल ज़ियाउल हक़ ने 11 साल शासन किया
पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल ज़ियाउल हक़ ने पाँच जुलाई 1977 को ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की सरकार का तख़्ता पलटकर सत्ता अपने हाथों में ले ली थी और इसी के साथ देश के इतिहास में एक नया दौर शुरू हुआ था जो 17 अगस्त 1988 को उनकी मौत के साथ समाप्त हुआ.

अपने शासन काल में उन्होंने चुनाव कराने का कई बार वादा किया लेकिन उस पर अमल टालते भी रहे.

सत्ता अपने हाथों में लेने के बाद टेलीविज़न पर अपने भाषण में जनरल ज़ियाउल हक़ ने कहा था कि उनका कोई राजनीतिक मक़सद नहीं है और भरोसा दिलाया था कि वह तीन महीने के अंदर चुनाव करा देंगे जिसके बाद सत्ता चुनी हुई सरकार को सौंप दी जाएगी और सेना अपनी ड्यूटी में लग जाएगी.

लेकिन 17 अगस्त 1988 को एक विमान दुर्घटना में उनकी मौत होने तक वह सैनिक शासक ही रहे.

1977 में तमाम विपक्षी नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया था और कहा गया था उन्हें सिर्फ़ कुछ ही समय के लिए नज़रबंद किया जा रहा है.

ज़ियाउल हक़ ने कहा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने देश को अस्थिर किया है जिसकी वजह से सेना को दख़ल देनी पड़ी है. भुट्टो को 1979 में फाँसी दे दी गई थी.

लेकिन जनरल ज़ियाउल हक़ ने 17 अगस्त 1988 को एक विमान हादसे में अपनी मौत तक सत्ता अपने हाथों में ही रखी और 11 साल के उनका शासन काल में देश की राजनीति में अनेक उतार चढ़ाव आए.

ज़ियाउल हक़ ने तीन महीने के अंदर चुनाव कराने का वादा किया था लेकिन चुनाव कई बार स्थगित किए गए और चुनाव हुए तो ख़ुद के मनोनीत किए गए प्रधानमंत्री मोहम्मद ख़ान जुनेजो को भी बर्ख़ास्त कर दिया था.

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो
भुट्टो को 1979 में फाँसी दे दी गई थी

इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता ज़फ़र अब्बास ने याद करने की कोशिश की है उस दिन की घटनाओं को जब जनरल ज़ियाउल हक़ ने जुनेजो को बर्ख़ास्त किया था---

29 मई 1988 का दिन पाकिस्तान के इतिहास में ख़ासी अहमियत रखता है क्योंकि उस दिन देश के फौजी शासन ने अपनी ही चुनी हुई सरकार को कुछ इस तरह बर्ख़ास्त किया कि आने वाले दिनों में साफ़ हो जाए कि इस देश में सेना के साथ मिलकर सत्ता चलाना तो संभव है लेकिन सत्ता असैनिक नेताओं के हाथों में कभी नहीं आ सकती.

और अगर कोई ऐसा करने की जुर्रत करेगा तो अपने अंजाम को पहुँचेगा.

मोहम्मद ख़ान जुनेजो पश्चिमी देशों के दौरे से 29 मई 1988 को लौटने पर हवाई अड्डे पर संवाददाताओं से रूबरू थे कि तभी सूचना मंत्रालय के प्रेस सूचना विभाग के कुछ अधिकारियों ने वरिष्ठ पत्रकारों को सरगोशियों में संदेश देना शुरू कर दिया कि उन्हें जुनेजो के संवाददाता सम्मेलन के बाद राष्ट्रपति भवन पहुँचना है.

जुनेजो का संवाददाता सम्मेलन काफ़ी लंबा खिंच गया था इसलिए कुछ पत्रकारों ने राष्ट्रपति भवन जाने के बजाय अपने दफ़्तरों की तरफ़ रुख़ करने का फ़ैसला किया लेकिन फिर भी कुछ पत्रकार राष्ट्रपति भवन पहुँच ही गए.

कुछ देर बाद शेरवानी पहने हुए जनरल ज़ियाउल हक़ पत्रकारों के सामने आए और पत्रकारों को बुलंद आवाज़ में सलाम किया. उन्होंने पहले से तैयार किया हुआ संदेश पढ़ना शुरू किया.

यह संविधान के 58वें संशोधन के तहत जुनेजो सरकार और प्रांतीय और केंद्रीय एसेंबलियों को बर्ख़ास्त करने का हुक्मनामा था.

जिस संसद ने तीन साल पहले फौजी सरकार के अनुरोध पर यह संवैधानिक संशोधन किया था वह ख़ुद ही उसका निशाना बन गई थी.

जुनेजो

प्रधानमंत्री मोहम्मद ख़ान जुनेजो कई अर्थों में विशिष्ट हस्ती थे. उन्हें जनरल ज़ियाउल हक़ ने ख़ुद इस पद के लिए चुना था लेकिन सत्ता में आने के बाद जुनेजो की यह पूरी कोशिश रही कि जितना जल्दी हो सके पूर्ण लोकतंत्र क़ायम किया जाए.

इस सिलसिले में उन्होंन कई अहम फ़ैसले भी किए और कुछ मौक़ों पर तो सैनिक अधिकारियों की आलोचना भी की. फौज की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान का मसला हल करने की ख़ातिर उन्होंने जिनेवा समझौता किया.

और जब आई एस आई की निगरानी में क़ायम शस्त्रागार में तबाही मची तो उन्होंने उसकी खुली जाँच का आदेश भी दिया.

अलबत्ता ये तमाम फ़ैसले करते वक़्त जुनेजो ये भूल गए कि देश का राष्ट्रपति एक सैनिक जनरल भी है और जुनेजो की सत्ता हस्तांतरण असैनिक प्रतिनिधियों के हाथों में सौंपने की कोशिश उन्हें ख़ासी महंगी पड़ी.

संवाददाताओं का कहना है कि ज़ियाउल हक़ के शासन काल में धार्मिक कट्टरता बढ़ी और धर्मनिर्पेक्ष मानी जाने वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेताओं को काफ़ी दबाव में रखा गया.

संवाददाताओं के अनुसार ज़ियाउल हक़ ने प्रेस की आज़ादी पर भी कुठाराघात किया और ऐसा भी सुनने में आया कि पत्रकारों को कौड़े भी लगाए गए.

1977 में सत्ता संभालने के दो साल बाद ही 1979 में पाकिस्तान के पड़ोसी देश अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सेनाएँ घुस गई थीं जिनके ख़िलाफ़ पश्चिमी देशों के अभियान में जनरल ज़ियाउल हक़ को काफ़ी मददगार पाया गया था.

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