| पाकिस्तान में फ़ौज के दबदबे पर चिंता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के एक मानवाधिकार गुट पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने देश में फ़ौज के बढ़ते दबदबे और सामाजिक संघर्षों को सुलझाने के लिए फ़ौज के इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई है. सन 2004 की रिपोर्ट जारी करते हुए आयोग ने सरकार पर संघर्ष वाले क़ाबायली इलाक़ो - दक्षिणी वज़ीरिस्तान और बलोचिस्तान में लोगों के आने-जाने पर रोक लगाने का आरोप लगाया है. पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट वहाँ मानवाधिकारों के बारे में जानकारी का सबसे विश्वसनीय स्रोत बन गया है. इस वर्ष की रिपोर्ट में लोकतंत्र, प्रशासन और सांप्रदायिक मुद्दों पर चर्चा की गई है. आयोग के अध्यक्ष ताहिर मोहम्मद ख़ान का कहना है कि आयोग को फ़ौज के दबदबे के बारे में चिंता है क्योंकि फ़ौजी अधिकारियों को छोटी-बड़ी कॉरपोरेशनों के अध्यक्ष बनाया जा रहा है. उनका कहना था कि आयोग संघर्ष वाले इलाक़ो से लोगों के विस्थापित होने पर भी नज़र रख रहा है. उनके अनुसार आयोग को ज़्यादा चिंता विस्थापित लोगों की देखरेख की है क्योंकि पत्रकारों और अन्य राहत संस्थाओं को इन क्षेत्रों में जाने की अनुमति नहीं है. रिपोर्ट में बढ़ते सांप्रदायिक दंगों और अल्पसंख्यकों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता के बारे में भी चिंता जताई गई है. इस बारे में क़ानूनी प्रावधानों के अभाव की बात भी की गई है. रिपोर्ट में बताया गया है कि परिवार की इज़्ज़त के नाम पर पिछले साल लगभग एक हज़ार महिलाओं की हत्या की गई और हज़ारों अन्य महिलाएँ पारिवारिक हिंसा का शिकार हुईं. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 34 प्रतिशत लोग ग़रीबी रेखा के नीचे और 33 हज़ार ऐसे लोग हैं जिन्होंने स्नातक या इससे आगे की पढ़ाई की है लेकिन उनके पास नौकरी नहीं है. |
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