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भारतीय पकवान का इतिहास सदियों पुराना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय पकवानों का इतिहास उनके स्वाद ही की तरह रंगबिरंगा और अनूठा है. भारतीय पकवानों की ख़ास बात है उनमें इस्तेमाल होने वाले मसाले, जिन्होंने दुनिया भर में उसे ख्याति दी है. इन्हीं मसालों के पीछे-पीछे कई विदेशी ताक़तें भी भारत आईं. भारत के मसालों का विवरण 629 ई. में चीनी सैलानी ह्यु सांग के सफ़रनामे और 1298 की मार्को पोलो की रचनाओं में भी मिलता है. देश के उत्तर में स्थित ख़ैबर दर्रे से होकर कई क़बीलों, पर्यटकों और व्यापारियों ने भारत में प्रवेश किया और अपने साथ खाना बनाने की अपनी विशेष कला भी साथ लाए, इस से भारतीय खाने और पकवानों के विकास पर काफ़ी गहरा प्रभाव पड़ा. भारत पर कई शताब्दी तक राज करने वाले मुग़लों ने भी ख़ैबर दर्रे से होकर ही भारत में प्रवेश किया था. मुग़ल पकवान अब भी भारत समेत विश्व भर में अत्याधिक लोकप्रिय हैं. भारतीय मसाले पश्चिमी भारत पर प्राचीन फ़ारस वालों का काफ़ी प्रभाव रहा जो अपने देश के धार्मिक पक्षपात से भाग कर भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात पहुँचे, यहां उन्हें पारसी कह कर बुलाया गया, भारतीय खाने और पकवानों पर उनका बड़ा गहरा प्रभाव है. इस के अलावा पुर्तगालियों ने मसालों और अन्य बहुमूल्य चीज़ों की खोज में भारत का रुख़ किया और देश के पश्चिमी घाट पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया. उन्होंने गोवा पर वर्षों तक शासन किया और उस क्षेत्र के रंगबिरंगे पकवानों में अब भी पुर्तगाली पकवानों की झलक दिखती है.
इस के विपरीत देश के पूर्वी क्षेत्र के पकवान बिलकुल ही अलग हैं. यहाँ खाना बनाने के तरीक़े तिब्बती शैली से प्रभावित हैं. इस के अलावा ख़ास ऐंग्लो-इंडियन पकवानों की झलक भी यहां मिलती है, जो कि उस काल की निशानी है जब कोलकता ब्रितानी राज की राजधानी थी. फिर भी इस इलाक़े रे क्षेत्रीय पकवान बंगाली हैं, जिस की एक अलग ही बात है. दक्षिण भारत के पकवानों में बहुत स्पष्ट क्षेत्री. रंग दिखता है. आंध्र प्रदेश, तामिलनाडु, कर्नाटक और केरल, इन सभी राज्यों के पकवानों की अपनी अलग पहचान और विशेषताएँ हैं. सदियों पुराने अपने इतिहास में भारत ने कई धर्मों और संस्कृतियों को अपना हिस्सा बनाया है. हर धार्मिक पंथ और बिरादरी का खाना बनाने का अपना विशेष तरीक़ा है. अलग-अलग क्षेत्र भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों का मतलब है कि देश के इन क्षेत्रों का मौसम बिलकुल भिन्न होता है और इस कारण वहाँ उगने वाली फ़स्लें और परिणामस्वरूप वहां बनने वाला खाना भी अलग होता है. अगर सोचा जाए तो इस में आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि भारत जैसे विशाल और अलग-अलग रीति रिवाज वाले देश के पकवानों में भी उसकी झलक दिखाई देती है. भारतीय खाने में इतने विभिन्न आयाम हैं कि बयान करना मुश्किल हो जाता है. विभिन्न क्षेत्रों में तरह-तरह के पकवान सब से बढ़ कर भारत के लोगों के इतिहास और उनकी संस्कृति को परिदृश्य करते हैं.
अलग-अलग क्षेत्रों में बनने वाले विभिन्न पकवानों के पीछे एक ऐसी चीज़ ज़रूर है जो इन सब को एक ही धागे में बांधती है, और वह है भारत के मसाले. यह मसाले ही तो हैं जो भारतीय खाने को, चोहे वह किसी भी क्षेत्र का हो, दिलकश रंग, स्वाद और सुगंध प्रदान करते हैं. मसालों का प्रयोग भी एक कला है, जो भारतीय पकवानों को अनूठा बनाता है. आज कल की दुनिया में भारतीय पकवानों को विश्व स्तर पर सराहा जा रहा है. भारत में जब इतने प्रकार के पकवान बनते हैं तो आप अनुमान लगा ही सकते हैं कि भारत से बाहर निकल कर भारतीय पकवानों ने कितने रूप धारण किए होंगे. दुनिया भर में भारत के खाने नए और अलग अलग ढंग से बनाए जा रहे हैं. घरों में बनाए जाने के साथ साथ भारतीय खाना अब यूरोप, अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, अफ़्रीका और अन्य कई देशों के सुपर-मार्केट में भी उपलब्ध है. पिछले कुछ वर्षों में मसालों के व्यापार में काफी बढ़ौतरी हुई है. भारत लगभग पांच टन मसाले का आयात करता है जिसकी क़ीमत लगभग 1500 मिलियन अमरीकी डालर है. (मृदुला बालजीकर का जन्म भारत के पूर्वी राज्य असम में हुआ. मृदुला ब्रिटेन में रहती हैं और भारतीय पकवानों पर लगभग एक दर्जन पुस्तकें लिख चुकी हैं. इसके अलावा वह व्यंजन कक्षाएँ भी चलाती हैं). |
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