|
फ़ास्ट फ़ूड के जवाब में स्लो फ़ूड | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आपने लज़ीज़ बर्गरों, फ़्रेंचफ़्राई, और पिज़्ज़ा जैसे 'फ़ास्ट फूड' के बारे में तो खूब सुना होगा और बच्चों से लेकर बड़ों तक सबने इनका मज़ा भी लिया होगा. ऐसे फ़ास्ट फ़ूड उपलब्ध कराने वाली मैकडॉनाल्ड और सबवे जैसी अंतर्राष्ट्रीय श्रंखला की सजी-मँजी दुकानों को अब कहीं भी देखा जा सकता है. पर क्या आपने 'स्लो फ़ूड' का नाम सुना है? हालाँकि इसकी चर्चा कम ही होती है लेकिन स्वाद से छेड़छाड़ के खिलाफ़ अपने स्वाद के अधिकार की माँग को लेकर 'स्लो फ़ूड' अभियान कोई 20 साल पहले इटली में शुरू हुआ था. फ़ास्ट फ़ूड के जवाब में शुरू हुआ यह अभियान अब तक दुनिया के पाँच महाद्वीपों के 45 देशों तक फैल चुका है और इस अभियान के दुनिया भर में अस्सी हज़ार से भी ज़्यादा सदस्य हैं. भारत में यह अभियान अब भारत की ओर रुख़ कर चुका है.
नवदन्या स्लो फ़ूड कैफ़े को शुरु किया है सुपरिचित वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता वंदना शिवा ने. स्लो फ़ूड अभियान के जनक, कार्लोस पेट्रिनी इस हफ्ते भारत में हैं और उन्होंने ही इस कैफ़े का उदघाटन किया. कार्लोस कहते हैं, "हर देश की खाद्य संस्कृति की अपनी अलग पहचान होती है, हर गाँव में अपने कुछ खास व्यंजन और बनाने की विधियाँ है जबकि फ़ास्ट फ़ूड दुनिया भर में एक तरह की मानक खाद्य संस्कृति को जन्म देता है." ऐसे में जहाँ एक तरफ़ फ़ास्ट फ़ूड दुनिया भर में एक ही तरह के स्वाद का खाना परोसता है, वहीं स्लो फ़ूड व्यंजनों को उनके मूल रूप में ही उपलब्ध कराता है. उन्होंने इटली के पास्ता की सैकड़ों किस्मों और टमाटर से तैयार व्यंजनों के साथ ही आयरलैंड की ब्रेड और चीज़ और भारतीय ढोकले का ज़िक्र किया. कैफ़े के उदघाटन के अवसर पर फ़िल्म अभिनेत्री नंदिता दास भी मौजूद थीं. नंदिता कहती हैं, "चाहे मैं केरल के किसी गाँव में रहूँ या फिर फ़्राँस जैसे शहर में, मैं वहीं के व्यंजन खाना पसंद करती हूँ." उन्होंने खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा कि अब दिल्ली में भी ऐसी जगह है जहाँ पर खाने के मूल स्वाद का लुफ़्त उठा सकते हैं. याद आया बचपन विनय आदित्य एक प्रकाशक और डिज़ाइनर हैं. वो कहते हैं, मुझे फ़ास्ट फूड पसंद है, हालांकि मैं जानता हूँ कि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है.
आदित्य स्लो फ़ूड को एकदम भिन्न पाते हैं. वो कहते हैं, यह खाना अलग हटकर है और रोचक भी क्योंकि ऐसा स्वाद बचपन के दिनों में तो चखा था पर पिछले 15 सालों से हम ऐसा स्वाद भूल ही गए हैं. वंदना शिवा बताती हैं, हम लोगों को ऐसा खाना उपलब्ध करा रहे हैं जो बिना रसायन के तैयार फसलों से बनाया जाता है और एक ‘सफल किंतु काफ़ी दबावों में रह रहे’ भारतीय कृषि के लिए यह काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होगा. यह एक ऐसी जगह है जहाँ लोग डायबिटीज़, उच्च रक्तचाप या कोलेस्ट्रॉल की चिंता किए बगैर खाना खा सकते हैं. साथ ही यहाँ ऐसे युवाओं को खाद्य साक्षरता भी मिलेगी, जो अंकल चिप्स-मैकडोनाल्ड-कोकाकोला संस्कृति में ही पल रहे हैं. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||