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नानावती पर विपक्ष का प्रस्ताव नामंज़ूर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सिख विरोधी 1984 के दंगों की जाँच के लिए गठित नानावती आयोग की रिपोर्ट पर विपक्ष का लाया स्थगन प्रस्ताव लोक सभा में विफल रहा. इस प्रस्ताव के समर्थन में 128 सदस्यों ने वोट दिया जबकि इसके विपक्ष में 254 मत पड़े. एक सदस्य ने अपने आपको असंबद्ध किया. इसके पहले गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने कहा कि आयोग की रिपोर्ट को लेकर सरकार पर लीपापोती का आरोप ग़लत है. उन्होंने आश्वासन दिया कि नानावती आयोग की सभी सिफ़ारिशें मानी जाएँगीं और दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी. पाटिल ने स्पष्ट किया कि दंगों में कांग्रेसी नेताओं का हाथ नहीं था और रिपोर्ट में भी ऐसा कहीं पर नहीं कहा गया है. वामदलों की माँग इधर वामपंथी दलों ने सरकार से मांग की है कि जिनके ख़िलाफ़ भी आयोग ने सबूत होने की बात कही है उन सभी पर कार्रवाई करनी चाहिए. वहीं जॉर्ज फ़र्नांडिस ने कहा है कि सरकार की कार्रवाई रिपोर्ट को तो फाड़ कर फेंक देना चाहिए. सरकार की ओर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सदन को आश्वासन दिया है कि सरकार उन सभी लोगों के ख़िलाफ़ हर संभव क़ानूनी क़दम उठाएगी जिनका नाम आयोग ने लिया है. नानावती आयोग की सिफ़ारिशों पर कार्रवाई करने में सरकार की असफलता को लेकर कार्यस्थगन प्रस्ताव पर लोकसभा में चर्चा चल रही है. विपक्षी पार्टियों की कड़ी आलोचना और वामपंथी दलों की माँग के बाद केंद्र सरकार नानावती आयोग की रिपोर्ट पर संसद में बहस के लिए राज़ी हो गई थी. लेकिन राज्यसभा में अभी भी इस विषय पर चर्चा शुरु नहीं हो सकी और विपक्ष के हंगामे के बाद बैठक पहले एक घंटे के लिए और फिर पूरे दिन के लिए स्थगित करनी पड़ी. कार्यस्थगन प्रस्ताव अकाली दल के सुखदेव सिंह ढींढसा ने रखा. उन्होंने भारतीय इतिहास में सिखों के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि 84 के दंगों के मामले में सिखों को न्याय नहीं मिला है. इस बहस में हिस्सा लेते हुए विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि दिल्ली के तत्कालीन राज्यपाल ने आयोग के सामने जो कुछ कहा है उससे साफ़ है कि सेना बुलाने में देर की गई. उन्होंने कहा, "हम जानना चाहते हैं कि राजनीतिक शीर्ष पर बैठा कौन व्यक्ति था जिसकी वजह से सेना बुलाने में देर हुई और वह हिंसा किसने करवाई?" उन्होंने रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि स्थानीय कांग्रेस नेता ने दंगाइयों की मदद की. रिपोर्ट और कार्रवाई दोनों नामंज़ूर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नेता मोहम्मद सलीम ने कहा कि 84 का मामला सिर्फ़ सिखों का मामला नहीं है ठीक उसी तरह जिस तरह गुजरात का मामला सिर्फ़ मुस्लिमों का मामला नहीं है. उन्होंने कहा कि इस मामले पर संसद में चर्चा इसलिए नहीं हो रही है कि किसी को फाँसी चढ़ा दिया जाए बल्कि इसलिए हो रही है कि इस देश की व्यवस्था किस ओर जाएगी. उन्होंने कहा, "जो कुसूरवार हैं उनको सज़ा देनी ही होगी तभी हम अपनी व्यवस्था पर गर्व कर पाएँगे." उन्होंने कहा कि इस देश में ऐसा नहीं हो सकता कि रवैया दिल्ली के लिए अलग हो और गुजरात के लिए कुछ और हो. मोहम्मद सलीम ने कहा, "हम ये मानते हैं कि 21 साल से जो लोग न्याय के इंतज़ार में हैं नानवती आयोग ने उनके साथ न्याय नहीं किया." इसी तरह आयोग की रिपोर्ट पर सरकार की कार्रवाई को लेकर कहा कि वे अपनी पार्टी की ओर से यह कह रहे हैं कि कार्रवाई रिपोर्ट उन्हें पसंद नहीं है. उन्होंने कहा, "जिन लोगों का भी नाम आयोग ने लिया है उन सब पर कार्रवाई होनी चाहिए चाहे वे जो भी हों." राजनीति से ऊपर उठें - सिब्बल कांग्रेस की ओर से चर्चा में भाग लेते हुए केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि वे इन दंगों के गवाह रहे हैं और उन्होंने नहीं देखा कि दंगाइयों में कोई राजनीतिक नेता था. कपिल सिब्बल के इस आरोप पर भी जमकर हंगामा हुआ कि दंगों के संबंध में दर्ज करवाई गई रिपोर्ट में भाजपा कार्यकर्ताओं का नाम था. उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के इस सवाल को अप्रासंगिक बताया कि सेना बुलाने में देर के पीछे कौन था. उनका कहना था कि आयोग ने कह दिया है कि इसके पीछे कांग्रेस के बड़े नेता नहीं थे. कपिल सिब्बल ने राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर कहा, "होना ये चाहिए कि हम सब लोगों को संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर ये सोचना चाहिए कि अगर भविष्य में कुछ होगा तो हम उससे किस तरह निपटेंगे." एटीआर को फाड़ देना चाहिए - फर्नांडिस समाजवादी पार्टी के नेता सुमन ने कहा कि यह गंभीर मामला है और सरकार ने आयोग की रिपोर्ट पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की है. उन्होंने कहा कि सरकार को अपनी कार्रवाई रद्द करके नए सिरे से कार्रवाई करनी चाहिए. एनडीए के संयोजक जॉर्ज फ़र्नांडिस ने कहा कि कांग्रेस के लोग अब ये सवाल पूछ रहे हैं कि इतनी देर से आयोग क्यों बना तो जब दंगे हुए तो कांग्रेस की सरकार थी तो उसने तब क्या किया. उन्होंने कहा कि आयोग की रिपोर्ट पर जो कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) है उसे फाड़ देना चाहिए क्योंकि ये लोगों को बचाने के लिए बनाया गया है. उन्होंने आरोप लगाया कि ये बाबू लोगों ने बनाया है और उन्हें आश्चर्य है कि इसे कैबिनेट ने कैसे पास किया. इससे पहले प्रमुख विपक्षी गठबंधन एनडीए ने एक बैठक के बाद इस चर्चा में भाग लेने का फ़ैसला किया था. 1984 के सिख विरोधी दंगों पर आयोग की रिपोर्ट सोमवार को संसद में पेश की गई थी और इसके साथ ही सरकार ने इस मामले पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट भी पेश की थी. इससे पहले मंगलवार को संसद में विपक्षी सदस्यों ने रिपोर्ट में 'दोषी' पाए गए काँग्रेसी नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में सरकार की नाकामी का सवाल उठाते हुए भारी हंगामा किया और माँग की कि संसद के बाक़ी काम रोककर इस मामले पर बहस हो. |
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