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वामपंथियो ने भी कार्रवाई की मांग की | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने भी विपक्षी दलों के साथ सुर मिलाते हुए कहा है कि नानावती आयोग ने जिन लोगों की ओर इशारा किया है उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जानी चाहिए. वामपंथी दलों ने यह भी कहा है कि आयोग को जिन बिंदुओं की जाँच करनी थी उसे भी ठीक तरह से नहीं किया. उल्लेखनीय है 84 के सिख विरोधी दंगों की जाँच कर रहे नानावती आयोग की रिपोर्ट और इस पर सरकार की कार्रवाई की रिपोर्ट सोमवार को लोकसभा में पेश की गई थी. इसमें कांग्रेस के दो नेताओं जगदीश टाइटलर व सज्जन कुमार के दंगे में शामिल होने का इशारा किया है तथा दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल सहित कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) की पोलित ब्यूरो ने कहा है कि आयोग ने जिनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा है उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए ओर जिनकी ओर इशारा किया है उनके ख़िलाफ़ जाँच की जानी चाहिए. जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने भी कहा है कि जिनके ख़िलाफ़ भी आयोग ने प्रामाणिक सबूत होने की बात कही है उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरु करनी चाहिए. सीपीआई ने आयोग की रिपोर्ट को विरोधाभासी बताते हुए कहा है कि इसमें कांग्रेस के नेताओं को दोषी भी ठहराया गया है और उनके नाम भी नहीं दिए गए हैं. पार्टी का कहना है कि सरकार ने कार्रवाई रिपोर्ट में कई पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई करने में इसलिए असमर्थता ज़ाहिर की है क्योंकि वे रिटायर हो चुके हैं तो कोई इस देश के क़ानून से नहीं बच सकता. सीपीआई ने यह भी कहा है कि सरकार को पुलिस विभाग को पुनर्गठित करना चाहिए जिससे की उसकी विश्वसनीयता क़ायम हो सके. उधर सीपीएम ने कहा है सरकार की कार्रवाई रिपोर्ट पर भी असंतोष ज़ाहिर करते हुए कहा है कि आयोग ने जो सीमित अनुशंसाएं की हैं सरकार ने उस पर भी गंभीरता से कार्रवाई नहीं की है. नानावती आयोग की रिपोर्ट और सरकार की कार्रवाई रिपोर्ट को लेकर विपक्ष ने पहले ही घेर रखा है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि वामपंथी दलों के इस रुख़ से सरकार की मुसीबतें बढ़ सकती हैं. |
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