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दाग़ी मंत्रियों पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या उसे संविधान की भावना के संबंध में दाग़ी मंत्रियों से जुड़ी याचिका की सुनवाई करनी चाहिए? मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोटी सहित तीन न्यायाधीशों के एक पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया है. सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा है कि सुशासन या स्वच्छ प्रशासन क्या है यह किसे तय करना चाहिए. सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल हीरेन बैनर्जी ने कहा कि ये प्रधानमंत्री का अधिकार क्षेत्र है कि वे किसे मंत्रिमंडल में शामिल करें किसे नहीं. उनका कहना था कि इस पर न्यायालयों को टिप्पणी का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए. हीरेन बैनर्जी ने कहा कि यदि इस मामले में और बहस होती है तो लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परम्पराओं को आघात पहुँचेगा. विवाद वैसे भारत में यह पुरानी बहस रही है कि आख़िर संविधान की मूल भावना को बनाए रखने की प्रक्रिया में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अपने अपने कार्यक्षेत्र में किस हद तक रहना चाहिए. संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना था, "यदि कार्यपालिका अपनी ज़िम्मेदारी ठीक ढंग से नहीं निभा रही है तो उसमें न्यायपालिका के दखल को ग़लत नहीं ठहराया जा सकता." लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की राय इस मामले में कुछ अलग थी. बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि दाग़ी मंत्रियों को लेकर जो कुछ भी समस्या है वह न्यायालय को लेकर ही है क्योंकि न्यायालय समय पर मामले निपटा नहीं पा रही है. उनका कहना था, "यदि बिना फ़ैसला दिए यदि न्यायालय यह उम्मीद करती है कि बिना अपराध साबित हुए लोगों को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए तो यह ग़लत है." |
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