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अयोध्या हमले ने संघ परिवार को मिलाया | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाँच जुलाई को अयोध्या के विवादास्पद बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि परिसर पर हुआ हमले ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) परिवार को एक बार फिर एक कर दिया है. जिस परिवार के मुखिया एक दिन पहले तक गुजरात के सूरत में बैठकर यह चर्चा कर रहे थे कि लालकृष्ण आडवाणी और उनकी पार्टी के साथ क्या सलूक किया जाए वही परिवार एकाएक एक साथ सड़क पर आ गया है. केंद्र में एनडीए सरकार खो देने के बाद से जो आरएसएस परिवार हताशा में बिखरता दिख रहा था उसी परिवार के सदस्य फिर एक बार 'जय श्रीराम' 'मंदिर वही बनाएँगे' के नारे लगाते हुए कंधा से कंधा मिलाकर सड़कों पर उतर आए. टूटती हुई उम्मीद एक बार फिर जागती दिख रही है और एक बार फिर नेतृत्व वही आडवाणी जी कर रहे थे जिनको लेकर आरएसएस उम्मीद खो चुका था और जो विहिप नेता तोगड़िया की नज़र में 'ग़द्दार' हो चुके थे. बिखरता परिवार वैसे तो लालकृष्ण आडवाणी को आरएसएस का चहेता माना जाता था लेकिन धीरे-धीरे परिवार का मोह भंग हो रहा था.
केंद्र की सरकार हाथ से निकल जाने के बाद एकाएक परिवार को फिर से लगने लगा था कि सत्ता तक पहुँचने का रास्ता तो हिंदुत्व ही है. लेकिन एनडीए के अनुभव से बहुत कुछ सीख जान चुके आडवाणी चाहते थे कि वे किसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी की उदारवादी छवि हासिल कर सकें. इसीलिए विहिप ने कहा कि आडवाणी और वाजपेयी अब पार्टी का नेतृत्व करने योग्य नहीं हैं और उनकी जगह युवा नेतृत्व को लेना चाहिए. इतना मानों कम था कि आरएसएस प्रमुख केएस सुदर्शन ने भी कह दिया कि आडवाणी को अपना पद किसी युवा नेतृत्व के लिए छोड़ देना चाहिए. इन बयानों का विवाद ख़त्म नहीं हुआ था कि अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने कह दिया कि मोहम्मद अली जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे. इसके बाद संघ परिवार में जो घमासान शुरु हुआ उसने परिवार की आपसी खींचतान को सड़कों पर ला दिया, सार्वजनिक कर दिया. आरएसएस परिवार के तीन प्रमुख घटक हैं. एक ख़ुद आरएसएस, दूसरा उसकी सांस्कृतिक इकाई यानी विश्व हिंदू परिषद यानी विहिप और तीसरी राजनीतिक इकाई भारतीय जनता पार्टी है.
और इन तीनों के बीच ही कोई तालमेल नज़र नहीं आ रहा था. आरएसएस और विहिप का दावा है कि भाजपा को सरकार बनाने की स्थिति तक पहुँचाने के पीछे उन्हीं का योगदान था. और भाजपा इस स्थिति में नहीं है कि वह इन दावों को नकार सके. 80 के दशक में शुरु हुआ लालकृष्ण आडवाणी का राम मंदिर आंदोलन किस तरह सफल हुआ यह भाजपा से बेहतर कौन जानता है भला. एका लेकिन इस बिखराव पर उन चरमपंथियों ने एकाएक रोक लगा दी है जिन्होंने अयोध्या के विवादित परिसर पर हमला किया. 1988-89 में 'जय श्रीराम' का नारा लगवाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को जहाँ एक बार फिर सार्वजनिक रुप से नारा लगवाने का मौक़ा मिल गया वहीं भाजपा, विहिप और आरएसएस के कार्यकर्ताओं को मौक़ा मिल गया कि वह कह सके, 'रामलला हम आते हैं मंदिर वहीं बनाएँगे.' जिस 'राम' को केंद्र में सरकार बनाने के लिए भाजपा ने भुला दिया था आख़िर उसी 'राम' ने उसे आरएसएस के साथ संबंध सुधारने का एक नायाब मौक़ा दे दिया है.
सोमवार तक जो अशोक सिंघल भाजपा नेतृत्व से नाराज़ थे और अलग राजनीतिक पार्टी बनाने तक की बात कर रहे थे उन्होंने मंगलवार को कहा कि आरएसएस परिवार को एक अभेद्य किला है और इसमें कोई दरार नहीं डाल सकता. जिस विहिप के तोगड़िया को आडवाणी जी पर तनिक भी भरोसा नहीं बचा था उसी विहिप के नेता आडवाणी जी के नेतृत्व में आंदोलन करने उतर गए. जैसा कि समाचार एजेंसी पीटीआई ने आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से कहा है, "आरएसएस ने तय किया कि परिवार के सभी घटक मतभेद भुलाकर इस मुद्दे पर एक होकर क़दम उठाएँ." भले ही आडवाणी कह रहे हों कि राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर सामने आ गया है लेकिन अब न तो वो परिस्थितियाँ हैं और न भाजपा को लेकर कोई भ्रम बचा है ऐसे में परिवार को राम कितने दिनों तक एक रख पाते हैं यद देखना दिलचस्प होगा. |
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