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चिंतित कर रही है मानसून की गति | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ये इस साल का वो समय है जबकि खरीफ़ की फ़सल की बुआई होनी है और किसानों की निगाहें बादलों पर टिकी हुई हैं. आख़िर कब बरसेंगे ये बादल. मौसम विभाग को अंदेशा है कि केरल पहुँचे दक्षिण-पश्चिमी मानसून की गति धीमी पड़ गई है. जून और जुलाई के लिए भविष्यवाणी ऐसी नहीं है कि किसानों की चिंताएं दूर हों. भारतीय अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाली संस्था, सेंटर फ़ॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी ने तो 2005-6 की आर्थिक विकास दर का भी फिर से आकलन कर लिया है. संस्था का कहना है कि मौसम की प्रगति संतोषजनक नहीं है इसलिए उनका अनुमान है कि अब देश की आर्थिक विकास दर 6.6 की बजाय 6 प्रतिशत ही निर्धारित की गई है. बदरा बरसो पर मानसून पर अपने भाग्य के लिए भारतीय किसान आख़िर कब तक निर्भर रहेंगे. पूर्व सांसद, योजना और वित्त आयोग के सदस्य सोमपाल शास्त्री कहते हैं, "ऐसा नहीं हो सकता कि भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि की मानसून पर निर्भरता एकदम से ख़त्म हो जाए. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इसे कम नहीं किया जा सकता है." शास्त्री चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं, "दुर्भाग्य की बात है कि पिछले दो दशकों में केंद्र में चाहे जो भी सरकार रही हो, सिंचाई के सवाल की उपेक्षा ही की गई है. पाँचवे वित्त आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने के बाद से राज्यों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है और उसका सबसे बुरा असर सिंचाई पर पड़ा है." ग़ौरतलब है कि कृषि का आज भी राष्ट्रीय आय में 20-22 प्रतिशत योगदान है और हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब जैसे उत्तरी क्षेत्रों को छोड़ दें तो बाकी क्षेत्रों के छोटे किसान आज भी सिंचाई की जगह मानसून पर निर्भर रहते हैं. और ख़राब मानसून का असर कृषि तक सीमित भी नहीं रहता. इंस्टीट्यूट ऑफ़ इकॉनमिक ग्रोथ के निदेशक प्रोफ़ेसर बीबी भट्टाचार्य कहते हैं, " ग्रामीणों की ख़रीदारी की क्षमता आज औद्योगिक जगत के लिए एक महत्व का विषय है. ऐसे में मानसून का असर उद्योगों पर भी पड़ता है. बारिश कम होने से बिजली उत्पादन भी प्रभावित होता है. ऐसे में आज भी हमारी अर्थव्यवस्था के लिए मानसून एक महत्वपूर्ण पहलू है." पर कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मानसून का असर आज कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर उतना नहीं होता है जितना कि इसका मानवीय असर होता है. भारत सरकार के एक आर्थिक सलाहकार सौमित्र चौधरी कहते हैं, "कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में करीब 20 प्रतिशत योगदान है. मानसून का आर्थिक प्रभाव कम है क्योंकि बड़े किसान, जो मोटरसाइकिल या ट्रेक्टर ख़रीदने की क्षमता रखते हैं, उनका काम मानसून से कम प्रभावित होता है. " 'बेपरवाह सरकार' फिर भी एक ऐसे देश में, जहाँ कृषि से इतने लोगों की आजीविका टिकी है, सरकारें क्यों इस ओर ध्यान नहीं दे रही हैं. सोमपाल शास्त्री का कहना तो यह है कि एक ओर इस बात की चिंता है कि आगे के युद्ध पानी पर लड़े जाएंगे पर कृषि के लिए सिंचाई परियोजना पर खर्च नहीं किया जा रहा है. वो कहते हैं, "यह तो प्राथमिकता तय करने का सवाल है कि देश की पहली ज़रूरत पीने का पानी या सिंचाई का पानी है या फिर कुछ और है. उदाहरण के तौर पर पिछले वर्षों में 65-70 हज़ार करोड़ की खाद पर सब्सिडी ऐसी कंपनियों को दे दी गई. साथ ही 70-80 करोड़ संचार व्यवस्था के विकास में खर्च कर दिया." राज्य सरकारों का कहना है कि उनकी हालत खस्ता है और सिंचाई पर खर्च की उनकी हैसियत नहीं है. हालांकि विकासशील देशों में जहाँ कृषि का योगदान घटा है, वहीं भारत में अभी तक ऐसा नहीं हुआ है. साथ ही कृषि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा रोज़गार प्रदान करता है. प्रोफ़ेसर बीबी भट्टाचार्य इस बारे में कहते हैं, "गठबंधन की राजनीति का नकारात्मक प्रभाव सामने आने लगा है. कोई भी सरकार ऐसी नहीं है जो कड़ाई के साथ यह घोषणा कर सके कि टैक्स कृषि पर बढ़ाया जाएगा या फिर ऊर्जा, पानी और उर्वरकों के लिए ज़्यादा दाम वसूल किए जाएंगे." प्राथमिकता एक अनुमान के मुताबिक अगर इस बार बारिश 10 प्रतिशत कम होती है तो कृषि उत्पादन 4 प्रतिशत कम रहेगा और इसका असर उद्योगों पर भी पड़ेगा जिसकी विकास दर डेढ़ प्रतिशत कम होगी. यानी भारत में उच्च तकनीकी के क्षेत्र में विकास हो रहा है जहाँ रोज़गार पैदा नहीं होते. भारत जहाँ आठ प्रतिशत विकास दर की बात करता है वहीं बेरोज़गारी की दर भी 9-10 प्रतिशत बनी हुई है. सोमपाल शास्त्री इस बारे में बताते हैं, "नीति निर्धारकों की संवेदनहीनता और बहुत हद तक छोटे निहित स्वार्थों के कारण प्राथमिकताओं में कोई बदलाव नहीं आ रहा है." किसान तो किसान, यहाँ घरेलू उत्पाद बनानेवाली कंपनियां हों या फिर ट्रैक्टर उद्योग, सभी मानसून पर नज़र रख रहे हैं. |
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