| अल्फ़ा ने अमरीका से अपील की | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अलगाववादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (अल्फ़ा) ने अमरीका से अपील की है कि असम समस्या सुलझाने के लिए वह भारत पर दबाव बनाए. अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को संबोधित अपील में अल्फ़ा के चेयरमैन अरबिंदा राजखोवा ने कहा कि इस समस्या के कारण जारी हिंसा से जान-माल का भारी नुकसान हुआ है और इसका समाधान होना चाहिए. ये अपील उस समय की गई है जब भारत सरकार अल्फ़ा को बातचीत का न्यौता दे चुकी है और असम की संप्रभुता समेत किसी भी मुद्दे पर बात करने को तैयार है. अब तक विद्रोहियों का रुख़ था कि यदि असम की संप्रभुता पर बात नहीं हो सकती तो वे बातचीत में शामिल होने को तैयार नहीं होंगे. राजखोवा का आरोप था कि भारत असम की 'प्रकृतिक संपदा को लूट रहा है' और लोगों को आत्म निर्णय का अधिकार नही दे रहा है. उनका दावा था कि असम कभी भी भारत का भाग नहीं रहा और हिंसा में दस हज़ार लोग अपनी जान गँवा चुके हैं. पर्यवेक्षकों को हैरत है कि अल्फ़ा ने अमरीका से अपील क्यों की है जब उम्मीद ये जताई जा रही है कि वे पूर्वोत्तर के अन्य अलगाववादी संगठनों के साथ भारत सरकार के बातचीत शुरु करेंगे. हाल में भारत से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने राजखोवा को पत्र लिखकर बातचीत शुरु करने की पेशकश की थी. अल्फ़ा की माँग है कि उसके सभी वरिष्ठ नेताओं को रिहा किया जाए ताकि वे अगले हफ़्ते किसी अज्ञात स्थान पर अल्फ़ा की केंद्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाग ले पाएँ. लेकिन भारत सरकार ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वह इस माँग को मानेगा. अल्फ़ा की कार्यकारिणी के 16 सदस्यों में से केवल छह जेल से बाहर हैं. पर्यवेक्षकों का मानना है कि अल्फ़ा को हाल में अमरीकी विदेश मंत्रालय ने 'आतंकवादी संगठनों की सूची' में शामिल किया है जिससे उसके वरिष्ठ नेताओं में भय व्याप्त है. पर्यवेक्षक मानते हैं कि अमरीका को संतुष्ट करने के लिए अल्फ़ा उसे बताना चाहता है कि वह आतंकवादियों का गुट नहीं बल्कि भारत में न्यायोचित संघर्ष कर रहा है. |
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