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उग्रवाद के साए में पूर्वोत्तर के राज्य | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुंदर पहाड़ियों, घाटियों व नदियों से घिरे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह साल भी बीते कुछ वर्षों की तरह ही उग्रवाद के साए में रहा. उग्रवाद, शांति व अशांति के बीच असमंजस में फंसे लोग और राजनीतिक दल. ‘सात बहनों’ के नाम से मशहूर पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों में प्राकृतिक सौंदर्य का खजाना बिखरा पड़ा है. लेकिन इनकी चर्चा इसके लिए नहीं, बल्कि चरमपंथ के लिए ही ज्यादा होती रही है. बीते दो दशकों से भी ज्यादा समय से यह पूरा इलाक़ा उग्रवाद का पर्याय बन गया है. हर नया साल इलाके के लोगों के लिए नई सुबह का संदेश लेकर जरूर आता है लेकिन बीतते न बीतते वह चरमपंथ की अपनी पारंपरिक छवि को और पुख्ता कर जाता है. उम्मीद इस साल के आखिर में नगा चरमपंथी संगठन नेशनल कौंसिल आफ नगालैंड (आई-एम) गुट के दो नेताओं इसाक व मुइवा के नगालैंड पहुंचने से एक बार फिर शांति की उम्मीदें बढ़ी हैं लेकिन साथ ही इसने पड़ोसी राज्यों में कई आशंकाओं को भी उभार दिया है. इस साल ‘पूर्वोत्तर का प्रवेशद्वार’ कहे जाने वाले असम के अलावा नगालैंड व मणिपुर गलत वजहों से लगातार सुर्खियों में रहे. तो सबसे पहले असम की बात. डेढ़ साल बाद होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए तरुण गोगोई की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार चरमपंथी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम यानी अल्फा से लगातार बातचीत की अपील करती रही. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. साल के आखिरी महीनों में जानी-मानी लेखिका इंदिरा गोस्वामी ने इस मामले में मध्यस्थता की पहल करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत कई केंद्रीय नेताओं से मुलाकात की. लेकिन बातचीत की राह के पेंच अभी सुलझे नहीं हैं. अल्फा बिना शर्त बातचीत और इसमें संप्रभुता के मुद्दे पर चर्चा करने पर जोर दे रहा है. मामला यहीं अटका है. गांधी जयंती के मौके पर बोड़ो चरमपंथी गुट नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोड़ोलैंड (एनडीएफबी) ने राज्य के विभिन्न इलाकों में बम विस्फोट कर पचास से ज्यादा लोगों को मार डाला. इससे पहले 15 अगस्त को एक समारोह में विस्फोट से भी एक दर्जन से ज्यादा स्कूली बच्चे मारे गए थे. इस संगठन ने बाद में केंद्र से बातचीत की मंशा जताई. फिलहाल इसके मसविदे पर काम चल रहा है. सैकड़ों लोगों का खून बहने के बाद बातचीत के लिए उसका आगे आने को एक बढ़िया संकेत माना जा सकता है. हालांकि यह एक अलग बहस का विषय है कि क्या बातचीत से कोई ठोस हल निकलेगा? मुख्यमंत्री तरुण गोगोई मानते हैं कि इससे राज्य में शांति बहाल होगी. वे कहते हैं कि ‘बोड़ो क्षेत्रीय परिषद के गठन के बाद एक अन्य संगठन बोड़ो लिबरेशन टाइगर्स ने भी हथियार डाल दिए.’ गोगोई का कहना है कि ‘एक बार अल्फा से बातचीत शुरू हो जाए तो राज्य में स्थिति स्वाभाविक होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी.’ लेकिन ऐसा कब होगा? इस यक्ष प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं है. नागालैंड नगालैंड में दीमापुर रेलवे स्टेशन पर व बाजार में गांधी जयंती को हुए विस्फोटों में भी 50 से ज्यादा लोग मारे गए. केंद्र के साथ चलने वाली शांति प्रक्रिया के बावजूद राज्य में अशांति का ही माहौल रहा. चरमपंथी संगठन आपस में ही मारकाट में लगे रहे. राज्य में जबरन वसूली भी जस की तस जारी रही. शांति की प्रक्रिया व इसके मुद्दों के बारे में विभिन्न नगा संगठनों में मतभेद के चलते अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी है. अब शीर्ष नगा नेताओं के दौरे ने पड़ोसी मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश व असम के लोगों के इस डर को फिर उभार दिया है कि कहीं ‘ग्रेटर नगालिम’ की उनकी मांग के चक्कर में राज्यों के कुछ इलाके कट नहीं जाएं. नगा नेताओं के बीते दौरे के समय भी यह ‘शांति प्रक्रिया’ इलाके में अशांति का सबब बन गई थी. मणिपुर असम राइफल्स के जवानों के हाथों एक कथित चरमपंथी युवती मनोरमा देवी की बलात्कार के बाद हत्या के मुद्दे पर इस साल मणिपुर महीनों तक हिंसा की आग में जलता रहा. राज्य के तमाम लोग व राजनीतिक संगठन इस घटना के बाद सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को वापस लेने की मांग में सड़कों पर उतर आए. महीनों तक कर्फ्यू लगा रहा. आखिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य के अपने दौरे के दौरान लोगों के घावों पर मरहम लगाने का प्रयास किया और ऐतिहासिक कांगला फोर्ट,जहां असम राइफल्स का मुख्यालय था, को राज्य सरकार को सौंप दिया. साल के आखिरी दिनों में म्यामां से सटे राज्य के इलाकों में चरमपंथी गुटों के शिविरों के सफाए का अभियान चला. इसमें सेना को काफी कामयाबी मिली. यह पहला मौका था जब उग्रवादियों की शरणस्थली माने जाने वाले इस देश ने अपनी सीमाएं सील कर दी थीं ताकि उग्रवादी बागकर वहां पनाह नहीं ले सकें. दरअसल, म्यामां के एक प्रशासक सीनियर जनरल थान श्वे के भारत दौरे के बाद ही दोनों देशों में इस मुद्दे पर सहमति बनी थी. मेघालय ‘पूरब का स्काटलैंड’ कही जाने वाली मेघालय की राजधानी शिलांग में भी इस साल अपहरण व हिंसा की छिटपुट घटनाओं के अलावा शांति रही. लालदेंगा के खूनी आंदोलन के चलते दो दशकों तक चर्चा में रहा मिजोरम भी शांत रहा. अरुणाचल में एकाध घटनाएं जरूर हुईं. लेकिन यह राज्य इस साल दलबदलुओं के कारण ही ज्यादा चर्चा में रहा. फिलहाल, सातों बहनें शांत हैं. क्या नया साल इलाके में शांति बहाली का कोई नया संदेश लेकर आएगा? नगा नैताओं के दौरे के बाद इस पर कयास ही लगाए जा सकते हैं. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि नगा समस्या का कोई ठोस हल नहीं निकलने तक इलाके में सामान्य स्थिति बहाल करने की तमाम कवायद बेमतलब ही साबित होगी. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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